Thursday, February 29, 2024
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एक सुनार और उसके दोस्त : कश्मीर की लोक-कथा

Ek Sunar Aur Uske Dost : Lok-Katha (Kashmir)

इस तरह हम सोच सकते हैं कि कुछ ही समय में उसके पास उसका सारा पैसा खत्म हो गया होगा। अब उसके पास एक पैसा भी ऐसा नहीं था जिसको वह अपना कह सके।

जब वह गरीबी की इस हालत से गुजर रहा था तो उसके ससुर ने उसकी सहायता की। उसने उसकी पत्नी को यानी अपनी बेटी को घर का खर्च चलाने के लिये सौ रुपये दिये।

जब सुनार का ससुर अपनी बेटी को सौ रुपये दे कर चला गया तो वह अपनी पत्नी से बोला — “अगर मेरे पास पच्चीस रुपये होते तो में उससे एक ऐसा गहना बना सकता था जिसको में आसानी से सौ रुपये का बेच सकता था।”

पत्नी ने पूछा — “क्या तुम सचमुच ऐसा कर सकते हो?”

सुनार ने जवाब दिया — “हाँ बिल्कुल कर सकता हूँ।”

उसकी पत्नी ने तुरन्त ही पच्चीस रुपये निकाल कर देते हुए उससे कहा — “तो यह लो पच्चीस रुपये और करके दिखाओ।”

सुनार ने वे रुपये लिये अपनी दूकान पर गया और अपनी पूरी होशियारी लगा कर एक कंगन बनाया। वह उसकी कारीगरी का अच्छा नमूना था। उसको देख कर खुश होते हुए उसने सोचा कि वह जरूर उसके लिये कुछ अच्छा भाग्य ले कर आयेगा। वह उसको काफी ऊँचे दाम पर बेच सकेगा।

उसको बनाने के तुरन्त बाद ही वह उसको बेचने के लिये चल दिया।

रास्ते मे उसको वजीर का एक बेटा मिला। वजीर के बेटे ने उसको नमस्ते की और पूछा — “दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई अच्छा सा कंगन है?”

सुनार बोला — “हाँ है। और क्योंकि आपने मुझे अपना दोस्त कहा है इसलिये मैं उसे आपको ऐसे ही दे देता हूँ।”

कंगन उसको दे कर खाली हाथ वह घर लौटा तो उसने अपनी पत्नी से पच्चीस रुपये इस शर्त पर और माँगे कि वह उनको भारी ब्याज सहित वापस कर देगा। उसकी पत्नी ने उसको पच्चीस रुपये और दे दिये।

इन पच्चीस रुपयों से उसने पहले जितना ही सुन्दर एक और कंगन बनाया और उसको बेचने चल दिया। वह कुछ ही दूर गया था कि उसको दीवान साहब का बेटा मिल गया। उसने भी सुनार को नमस्ते की और पूछा — “ओ दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई सुन्दर कंगन है बेचने के लिये?”

सुनार बोला — “हाँ साहब है।” कह कर उसने वह नया कंगन उसको दिखा दिया।

नौजवान ने पूछा — “इसकी क्या कीमत है?”

सुनार बोला — “कुछ भी नहीं। क्योंकि आपने मेरे साथ इतना अच्छा बरताव किया है इसलिये मैं भी आपसे उतने ही अच्छे तरीके से बरताव करूँगा। लीजिये यह कंगन लीजिये यह आप ही के लिये है।”

वह घर फिर से खाली हाथ लौट आया और अपनी पत्नी को पच्चीस रुपये और देने पर मना लिया। पर उसकी पत्नी को अब अपना पैसा फायदे पर लगाने में कुछ कुछ शक सा होने लगा था सो उसने इस बार उसको पैसे देने से मना किया।

“यह बताओ तुमने मेरे पैसों का किया क्या? तुमने मुझसे कहा था कि तुम मेरे पच्चीस रुपयों के सौ रुपये बना कर दोगे पर तुम मुझसे पचास रुपये ले चुके हो और तुमने मुझे एक पैसा भी वापस नहीं किया है। और तुम मुझसे और पैसे माँग रहे हो।”

सुनार बोला — “बेवकूफ मत बनो। मुझे मालूम है कि मैंने क्या कहा था और मैंने क्या किया है। मैंने तुम्हारा पैसा बिल्कुल नहीं खोया है। मुझे थोड़ा समय दो तुम देखोगी कि इस बिजनस में मैं तुम्हें कितना सारा पैसा कमा कर दूँगा।”

पत्नी ने उसकी प्रार्थना पर तरस खा कर उसको पच्चीस रुपये और दे दिये। इन पैसों का भी उसने एक और नया कंगन बनाया जो पहले जैसा ही सुन्दर था। कंगन बना कर और उसको ले कर वह फिर पहले की तरह से उसको बेचने के लिये चला।

इस बार रास्ते में उसको इत्तफाक से एक चोर मिला। उसने भी उससे कहा — “दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई कंगन बेचने के लिये है?” इस पर सुनार ने वह कंगन उसको दे दिया। उसकी कीमत पूछने पर उसने उसकी भी उससे कोई कीमत नहीं ली। और एक बार फिर सुनार खाली हाथ घर वापस आ गया।

घर जा कर उसने अपनी पत्नी को वह सब बताया जो कुछ अब तक उसने किया था।

कुछ दिन बाद बचे हुए पच्चीस रुपये घर के खरचे में खर्च हो गये। तो एक दिन उसकी पत्नी बोली — “अब मेरे पास घर के खर्च के लिये एक पैसा भी नहीं है।”

सुनार ने सोचा “अब मुझे अपने दोस्तों को जाँचना चाहिये।” उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहिने और वजीर के घर गया पर उसको वजीर नहीं मिला। फिर वह दीवान के घर गये तो वहाँ उसको दोनों मिल गये। उसको तुरन्त ही उनके सामने उनके सामने ले जाया गया। उन्होंने भी उससे अपने दोस्त की तरह से बताव किया।

इत्तफाक से उसी समय वहाँ राजा की बेटी आ गयी। वह भी आ कर वहीं बैठ गयी और बात करने लगी। बातों ही बातों में उसने पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो उस पर एक मेहरबानी कर सके।

वह अपने पिता के बागीचे से एक खास नाशपाती के पेड़ की नाशपाती चाहती थी पर वह यह नहीं जानती थी कि उस पेड़ से फल कैसे तोड़ें जायें। क्योंकि उस पेड़ के चारों तरफ केसर के पाउडर के सात गड्ढे थे।

जो कोई भी उस पेड़ तक जाता निश्चित रूप से उसके पैर केसर से रंग जाते और इस तरह वह पकड़ा जाता। और यही वह राजकुमारी चाहती नहीं थी। यह सुन कर तीनों ने कहा कि वे बिना पकड़े उस पेड़ के फलों को लाने की अपनी भरसक कोशिश करेंगे। कुछ देर बाद सुनार वहाँ से चला आया। वह तुरन्त चोर के पास पहुँचा। चोर उसको देख कर बहुत खुश हुआ और उससे खाना खा कर जाने की जिद की।

पर सुनार बोला — “इस समय नहीं फिर कभी। अभी तो मेरे दिमाग में कुछ दूसरी ही बात घूम रही है।”

चोर कुछ उत्सुकता के साथ बोला — “मुझे उम्मीद है कि वह कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी।”

सुनार बोला — “है तो। मुझे राजा के बागीचे में लगे एक नाशपाती के पेड़ से राजकुमारी के लिये उसकी नाशपातियाँ तोड़नी हैं। उस पेड़ के चारों तरफ केसर के पाउडर के सात गड्ढे हैं। जो कोई भी उस पेड़ तक उसकी नाशपाती तोड़ने जायेगा उसके पैर केसर से रंग जायेंगे और वह पकड़ा जायेगा।

राजकुमारी चाहती है कि बिना पकड़े गये उस पेड़ की नाशपातियाँ तोड़ी जायें। क्या तुम इसमें मेरी कुछ सहायता कर सकते हो? मैं इस चक्कर में अपनी जान गँवाना नहीं चाहता सो तुम्हारी सहायता से अगर मैं अपनी जान बचा सकूँ तो।”

चोर बोला — “तुम चिन्ता न करो मैं तुम्हारे लिये उस पेड़ की नाशपाती तोड़ लाऊँगा।” और वह उस पेड़ की नाशपातियाँ तोड़ लाया। हालाँकि उसने यह कैसे किया यह किसी को नहीं पता। एक दिन बीतने से पहिले ही उस पेड़ की नाशपातियाँ सुनार की दूकान में एक टोकरी में रखी थीं।

तुरन्त ही राजकुमारी वजीर और दीवान के बेटों और सुनार के बीच मुलाकात का समय तय किया गया और उस समय वे नाशपातियाँ उनके सामने लायी गयीं।

राजकुमारी ने तुरन्त ही वे नाशपातियाँ खाने की इच्छा प्रगट की सो दीवान के बेटे ने एक नाशपाती छीली और उसके छोटे छोटे टुकड़े काटे। उसने एक टुकड़े में चाकू की नोक घुसायी और उसको राजकुमारी को खिलाने की कोशिश की।

जब वह ऐसा कर रहा था तो अचानक राजकुमारी को छींक आ गयी। इससे वह चाकू उसके गले में लग गया और वह मर गयी। दीवान का बेटा चिल्ला पड़ा — “अरे यह मैंने क्या किया? मैंने तो राजकुमारी को मार दिया।”

वजीर का बेटा बोला — “इसमें तुमने कुछ नहीं किया यह सब मेरा कुसूर है।”

सुनार बोला — “नहीं नहीं तुम लोगों ने कुछ नहीं किया यह मेरी गलती है। अगर मैं नाशपाती न लाता तो उनको राजकुमारी को इस तरह से न खिलाया जाता। खैर अब हमको इस बात का इन्तजार नहीं करना चाहिये कि कोई हमको इस हालत में देख ले। हमको तुरन्त ही एक मटका लेना चाहिये और राजकुमारी को उसमें रख कर नदी में फेंक देना चाहिये नहीं तो उसका शरीर फूल जायेगा। इससे लोगों को पता चल जायेगा और फिर हमें फाँसी पर चढ़ा दिया जायेगा।”

तुरन्त ही एक कुम्हार के घर से मटका लाया गया और उसमें राजकुमारी के शरीर को रख कर नदी में फेंक दिया गया। शाम को देखा तो राजकुमारी का कहीं पता नहीं था। महल की सब इमारतों में उसकी खोज की गयी और दूसरी जगह भी उसको ढूँढा गया जहाँ जहाँ वह अक्सर जाया करती थी। पर उसका कहीं कोई पता नहीं था।

राजा ने एक शाही फरमान निकाल दिया कि जो कोई भी राजकुमारी के बारे में कुछ बतायेगा उसको भारी इनाम दिया जायेगा। अगले ही दिन एक आदमी राजा के सामने आया और उसको बताया कि पिछली शाम उसने एक आदमी को नदी में मटका फेंकते देखा था।

यह सुनते ही राजा ने नदी में राजकुमारी की ढूँढ शुरू करवा दी। नदी में मटका भी मिल गया और मटके में रखी सुन्दर राजकुमारी की लाश भी।

राजा ने फिर हुकुम सुनाया कि राज्य भर के सब कुम्हारों को उसके सामने पेश किया जाये और इस मामले की जाँच अच्छी तरह से की जाये।

सो राज्य के सारे कुम्हार राजा के सामने इक{े हुए। राजा ने उनसे पूछा कि हाल में ही किसने मटका बेचा था। एक कुम्हार सामने आया कि दो दिन हुए उसने एक मटका एक सुनार को बेचा था। इस पर सुनार को बुलवाया गया।

राजा ने सुनार से पूछा — “तुमने राजकुमारी को क्यों मारा? बोलो।”

सुनार चुप रहा तो राजा बोला — “सुनार की चुप्पी सुनार को मुजरिम बताती है। दो दिन के अन्दर अन्दर इसको फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।” तब तक के लिये सुनार को जेल में बन्द कर दिया गया।

अब क्योंकि सुनार ने कोई जवाब नहीं दिया था तो राजा ने उसकी फाँसी की सजा तो सुना दी पर उसका मन नहीं माना। उसने उसकी फाँसी को दो दिन के लिये और टाल दिया ताकि वह राजकुमारी की इस बुरी तरह से की गयी हत्या की सही सही वजह पता कर सके।

उसने एक गार्ड का वेश रखा और रात को जेल में सुनार के पास जा पहुँचा। उसने उससे कहा — “तुमको कल फाँसी लगने वाली है। क्या सब कुछ ठीक है या तुम्हारा कोई रिश्तेदार या कोई दोस्त ऐसा है जो इस समय तुम्हारी सहायता कर सके।”

सुनार बोला — “पूछने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। मरने से पहिले मैं अपने दो तीन दोस्तों से मिलना चाहूँगा।”

गार्ड बोला — “ठीक है। आओ मैं तुम्हें उनसे मिलवाता हूँ।”

सुनार उसके साथ चल दिया। सबसे पहिले सुनार वजीर के घर गया वहाँ उसने वजीर के बेटे से कुछ बात की। उसने उससे कहा — “ओ मेरे दोस्त जब मैं फाँसी के फन्दे की तरफ जा रहा होऊँगा तब तुम मेरे लिये क्या कुछ कर सकते हो?”

वजीर का बेटा बोला — “हाँ हाँ जरूर। तुम खुश रहना।

ठीक समय पर मैं कमान्डर इन चीफ अपने सिपाहियों को इशारा करूँगा और वे राजा को मार देंगे।”

इसके बाद सुनार दीवान के घर गया और उसके सबसे बड़े बेटे से बहुत देर तक बातें करता रहा — “मेरे अच्छे दोस्त तुम मेरी रिहाई के लिये क्या कर सकते हो?”

नौजवान बोला — “तुम डरो नहीं। मैं तुम्हारी मेहरबानियों को नहीं भूल सकता। मैं ठीक समय पर आऊँगा और राजा को मार दूँगा।” गार्ड ने भी यह सब सुना तो वह तो डर के मारे काँप गया। इसके बाद सुनार अपने तीसरे दोस्त चोर के पास गया। उसने उससे भी वही सवाल किया जो उसने अपने पहिले दोनों दोस्तों से किया था। चोर ने उसकी नमस्ते का जवाब दिया और उसको कुछ देर बैठने के लिये कहा क्योंकि उस समय वह कोई बहुत जरूरी काम कर रहा था।

उसने सुनार की बात सुनी और महसूस किया कि सुनार बहुत कष्ट में है। उसने उसकी सहायता करने का इरादा किया हालाँकि इसमें उसकी जान का खतरा था।

वह उसी पल वहाँ से चला गया और राजा के महल की खिड़की से हो कर महल की छत पर चढ़ गया। वहाँ से फिर वह राजा के सोने के कमरे में चला गया और उस आदमी का सिर काट दिया जो उस रात वहाँ राजा की जगह सो रहा था।

यह करके उसने सोचा “अब सुनार को किसी बात का डर नहीं होना चाहिये।” यह सोच कर वह उस आदमी का सिर अपने हाथ में ले कर सुनार के पास दौड़ आया।

उसने वह सिर सुनार और गार्ड के सामने फेंकते हुए कहा — “यह लो। अब तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गयीं। अब राजा तुम्हें बिल्कुल परेशान नहीं कर सकता।” इसके बाद सुनार गार्ड के साथ जेल में लौट आया।

अगले दिन वह सब लोगों और सिपाहियों के सामने फाँसी के फन्दे की तरफ ले जाया गया। जैसे ही वह फाँसी के चबूतरे के पास पहुँचा तो दीवान का बेटा अपनी तलवार खींच कर राजा को मारने के लिये आगे बढ़ा। उधर वजीर के बेटे ने भी अपनी सेना को इशारा किया कि वह इस काम में उसकी सहायता करे।

पर इस सबकी जरूरत ही नहीं थी क्योंकि राजा ने सोच रखा था कि उसको क्या करना है। वह चिल्लाया — “सुनार को छोड़ दो उसे आजाद कर दो। उसको माफ किया जाता है।”

इस पर वहाँ खड़े सब लोग चिल्ला पड़े — “राजा की जय हो। राजा अमर रहे।”

(सुषमा गुप्ता)

एक बार की बात है कि एक सुनार था जिसमें कई बुरी आदतें थीं उनमें से उसकी दो बुरी आदतें खास थीं — एक तो वह बहुत पियक्कड़ था और दूसरे बहुत खर्चीला था।

इस तरह हम सोच सकते हैं कि कुछ ही समय में उसके पास उसका सारा पैसा खत्म हो गया होगा। अब उसके पास एक पैसा भी ऐसा नहीं था जिसको वह अपना कह सके।

जब वह गरीबी की इस हालत से गुजर रहा था तो उसके ससुर ने उसकी सहायता की। उसने उसकी पत्नी को यानी अपनी बेटी को घर का खर्च चलाने के लिये सौ रुपये दिये।

जब सुनार का ससुर अपनी बेटी को सौ रुपये दे कर चला गया तो वह अपनी पत्नी से बोला — “अगर मेरे पास पच्चीस रुपये होते तो में उससे एक ऐसा गहना बना सकता था जिसको में आसानी से सौ रुपये का बेच सकता था।”

पत्नी ने पूछा — “क्या तुम सचमुच ऐसा कर सकते हो?”

सुनार ने जवाब दिया — “हाँ बिल्कुल कर सकता हूँ।”

उसकी पत्नी ने तुरन्त ही पच्चीस रुपये निकाल कर देते हुए उससे कहा — “तो यह लो पच्चीस रुपये और करके दिखाओ।”

सुनार ने वे रुपये लिये अपनी दूकान पर गया और अपनी पूरी होशियारी लगा कर एक कंगन बनाया। वह उसकी कारीगरी का अच्छा नमूना था। उसको देख कर खुश होते हुए उसने सोचा कि वह जरूर उसके लिये कुछ अच्छा भाग्य ले कर आयेगा। वह उसको काफी ऊँचे दाम पर बेच सकेगा।

उसको बनाने के तुरन्त बाद ही वह उसको बेचने के लिये चल दिया।

रास्ते मे उसको वजीर का एक बेटा मिला। वजीर के बेटे ने उसको नमस्ते की और पूछा — “दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई अच्छा सा कंगन है?”

सुनार बोला — “हाँ है। और क्योंकि आपने मुझे अपना दोस्त कहा है इसलिये मैं उसे आपको ऐसे ही दे देता हूँ।”

कंगन उसको दे कर खाली हाथ वह घर लौटा तो उसने अपनी पत्नी से पच्चीस रुपये इस शर्त पर और माँगे कि वह उनको भारी ब्याज सहित वापस कर देगा। उसकी पत्नी ने उसको पच्चीस रुपये और दे दिये।

इन पच्चीस रुपयों से उसने पहले जितना ही सुन्दर एक और कंगन बनाया और उसको बेचने चल दिया। वह कुछ ही दूर गया था कि उसको दीवान साहब का बेटा मिल गया। उसने भी सुनार को नमस्ते की और पूछा — “ओ दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई सुन्दर कंगन है बेचने के लिये?”

सुनार बोला — “हाँ साहब है।” कह कर उसने वह नया कंगन उसको दिखा दिया।

नौजवान ने पूछा — “इसकी क्या कीमत है?”

सुनार बोला — “कुछ भी नहीं। क्योंकि आपने मेरे साथ इतना अच्छा बरताव किया है इसलिये मैं भी आपसे उतने ही अच्छे तरीके से बरताव करूँगा। लीजिये यह कंगन लीजिये यह आप ही के लिये है।”

वह घर फिर से खाली हाथ लौट आया और अपनी पत्नी को पच्चीस रुपये और देने पर मना लिया। पर उसकी पत्नी को अब अपना पैसा फायदे पर लगाने में कुछ कुछ शक सा होने लगा था सो उसने इस बार उसको पैसे देने से मना किया।

“यह बताओ तुमने मेरे पैसों का किया क्या? तुमने मुझसे कहा था कि तुम मेरे पच्चीस रुपयों के सौ रुपये बना कर दोगे पर तुम मुझसे पचास रुपये ले चुके हो और तुमने मुझे एक पैसा भी वापस नहीं किया है। और तुम मुझसे और पैसे माँग रहे हो।”

सुनार बोला — “बेवकूफ मत बनो। मुझे मालूम है कि मैंने क्या कहा था और मैंने क्या किया है। मैंने तुम्हारा पैसा बिल्कुल नहीं खोया है। मुझे थोड़ा समय दो तुम देखोगी कि इस बिजनस में मैं तुम्हें कितना सारा पैसा कमा कर दूँगा।”

पत्नी ने उसकी प्रार्थना पर तरस खा कर उसको पच्चीस रुपये और दे दिये। इन पैसों का भी उसने एक और नया कंगन बनाया जो पहले जैसा ही सुन्दर था। कंगन बना कर और उसको ले कर वह फिर पहले की तरह से उसको बेचने के लिये चला।

इस बार रास्ते में उसको इत्तफाक से एक चोर मिला। उसने भी उससे कहा — “दोस्त क्या तुम्हारे पास कोई कंगन बेचने के लिये है?” इस पर सुनार ने वह कंगन उसको दे दिया। उसकी कीमत पूछने पर उसने उसकी भी उससे कोई कीमत नहीं ली। और एक बार फिर सुनार खाली हाथ घर वापस आ गया।

घर जा कर उसने अपनी पत्नी को वह सब बताया जो कुछ अब तक उसने किया था।

कुछ दिन बाद बचे हुए पच्चीस रुपये घर के खरचे में खर्च हो गये। तो एक दिन उसकी पत्नी बोली — “अब मेरे पास घर के खर्च के लिये एक पैसा भी नहीं है।”

सुनार ने सोचा “अब मुझे अपने दोस्तों को जाँचना चाहिये।” उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहिने और वजीर के घर गया पर उसको वजीर नहीं मिला। फिर वह दीवान के घर गये तो वहाँ उसको दोनों मिल गये। उसको तुरन्त ही उनके सामने उनके सामने ले जाया गया। उन्होंने भी उससे अपने दोस्त की तरह से बताव किया।

इत्तफाक से उसी समय वहाँ राजा की बेटी आ गयी। वह भी आ कर वहीं बैठ गयी और बात करने लगी। बातों ही बातों में उसने पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो उस पर एक मेहरबानी कर सके।

वह अपने पिता के बागीचे से एक खास नाशपाती के पेड़ की नाशपाती चाहती थी पर वह यह नहीं जानती थी कि उस पेड़ से फल कैसे तोड़ें जायें। क्योंकि उस पेड़ के चारों तरफ केसर के पाउडर के सात गड्ढे थे।

जो कोई भी उस पेड़ तक जाता निश्चित रूप से उसके पैर केसर से रंग जाते और इस तरह वह पकड़ा जाता। और यही वह राजकुमारी चाहती नहीं थी। यह सुन कर तीनों ने कहा कि वे बिना पकड़े उस पेड़ के फलों को लाने की अपनी भरसक कोशिश करेंगे। कुछ देर बाद सुनार वहाँ से चला आया। वह तुरन्त चोर के पास पहुँचा। चोर उसको देख कर बहुत खुश हुआ और उससे खाना खा कर जाने की जिद की।

पर सुनार बोला — “इस समय नहीं फिर कभी। अभी तो मेरे दिमाग में कुछ दूसरी ही बात घूम रही है।”

चोर कुछ उत्सुकता के साथ बोला — “मुझे उम्मीद है कि वह कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी।”

सुनार बोला — “है तो। मुझे राजा के बागीचे में लगे एक नाशपाती के पेड़ से राजकुमारी के लिये उसकी नाशपातियाँ तोड़नी हैं। उस पेड़ के चारों तरफ केसर के पाउडर के सात गड्ढे हैं। जो कोई भी उस पेड़ तक उसकी नाशपाती तोड़ने जायेगा उसके पैर केसर से रंग जायेंगे और वह पकड़ा जायेगा।

राजकुमारी चाहती है कि बिना पकड़े गये उस पेड़ की नाशपातियाँ तोड़ी जायें। क्या तुम इसमें मेरी कुछ सहायता कर सकते हो? मैं इस चक्कर में अपनी जान गँवाना नहीं चाहता सो तुम्हारी सहायता से अगर मैं अपनी जान बचा सकूँ तो।”

चोर बोला — “तुम चिन्ता न करो मैं तुम्हारे लिये उस पेड़ की नाशपाती तोड़ लाऊँगा।” और वह उस पेड़ की नाशपातियाँ तोड़ लाया। हालाँकि उसने यह कैसे किया यह किसी को नहीं पता। एक दिन बीतने से पहिले ही उस पेड़ की नाशपातियाँ सुनार की दूकान में एक टोकरी में रखी थीं।

तुरन्त ही राजकुमारी वजीर और दीवान के बेटों और सुनार के बीच मुलाकात का समय तय किया गया और उस समय वे नाशपातियाँ उनके सामने लायी गयीं।

राजकुमारी ने तुरन्त ही वे नाशपातियाँ खाने की इच्छा प्रगट की सो दीवान के बेटे ने एक नाशपाती छीली और उसके छोटे छोटे टुकड़े काटे। उसने एक टुकड़े में चाकू की नोक घुसायी और उसको राजकुमारी को खिलाने की कोशिश की।

जब वह ऐसा कर रहा था तो अचानक राजकुमारी को छींक आ गयी। इससे वह चाकू उसके गले में लग गया और वह मर गयी। दीवान का बेटा चिल्ला पड़ा — “अरे यह मैंने क्या किया? मैंने तो राजकुमारी को मार दिया।”

वजीर का बेटा बोला — “इसमें तुमने कुछ नहीं किया यह सब मेरा कुसूर है।”

सुनार बोला — “नहीं नहीं तुम लोगों ने कुछ नहीं किया यह मेरी गलती है। अगर मैं नाशपाती न लाता तो उनको राजकुमारी को इस तरह से न खिलाया जाता। खैर अब हमको इस बात का इन्तजार नहीं करना चाहिये कि कोई हमको इस हालत में देख ले। हमको तुरन्त ही एक मटका लेना चाहिये और राजकुमारी को उसमें रख कर नदी में फेंक देना चाहिये नहीं तो उसका शरीर फूल जायेगा। इससे लोगों को पता चल जायेगा और फिर हमें फाँसी पर चढ़ा दिया जायेगा।”

तुरन्त ही एक कुम्हार के घर से मटका लाया गया और उसमें राजकुमारी के शरीर को रख कर नदी में फेंक दिया गया। शाम को देखा तो राजकुमारी का कहीं पता नहीं था। महल की सब इमारतों में उसकी खोज की गयी और दूसरी जगह भी उसको ढूँढा गया जहाँ जहाँ वह अक्सर जाया करती थी। पर उसका कहीं कोई पता नहीं था।

राजा ने एक शाही फरमान निकाल दिया कि जो कोई भी राजकुमारी के बारे में कुछ बतायेगा उसको भारी इनाम दिया जायेगा। अगले ही दिन एक आदमी राजा के सामने आया और उसको बताया कि पिछली शाम उसने एक आदमी को नदी में मटका फेंकते देखा था।

यह सुनते ही राजा ने नदी में राजकुमारी की ढूँढ शुरू करवा दी। नदी में मटका भी मिल गया और मटके में रखी सुन्दर राजकुमारी की लाश भी।

राजा ने फिर हुकुम सुनाया कि राज्य भर के सब कुम्हारों को उसके सामने पेश किया जाये और इस मामले की जाँच अच्छी तरह से की जाये।

सो राज्य के सारे कुम्हार राजा के सामने इक{े हुए। राजा ने उनसे पूछा कि हाल में ही किसने मटका बेचा था। एक कुम्हार सामने आया कि दो दिन हुए उसने एक मटका एक सुनार को बेचा था। इस पर सुनार को बुलवाया गया।

राजा ने सुनार से पूछा — “तुमने राजकुमारी को क्यों मारा? बोलो।”

सुनार चुप रहा तो राजा बोला — “सुनार की चुप्पी सुनार को मुजरिम बताती है। दो दिन के अन्दर अन्दर इसको फाँसी पर चढ़ा दिया जाये।” तब तक के लिये सुनार को जेल में बन्द कर दिया गया।

अब क्योंकि सुनार ने कोई जवाब नहीं दिया था तो राजा ने उसकी फाँसी की सजा तो सुना दी पर उसका मन नहीं माना। उसने उसकी फाँसी को दो दिन के लिये और टाल दिया ताकि वह राजकुमारी की इस बुरी तरह से की गयी हत्या की सही सही वजह पता कर सके।

उसने एक गार्ड का वेश रखा और रात को जेल में सुनार के पास जा पहुँचा। उसने उससे कहा — “तुमको कल फाँसी लगने वाली है। क्या सब कुछ ठीक है या तुम्हारा कोई रिश्तेदार या कोई दोस्त ऐसा है जो इस समय तुम्हारी सहायता कर सके।”

सुनार बोला — “पूछने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। मरने से पहिले मैं अपने दो तीन दोस्तों से मिलना चाहूँगा।”

गार्ड बोला — “ठीक है। आओ मैं तुम्हें उनसे मिलवाता हूँ।”

सुनार उसके साथ चल दिया। सबसे पहिले सुनार वजीर के घर गया वहाँ उसने वजीर के बेटे से कुछ बात की। उसने उससे कहा — “ओ मेरे दोस्त जब मैं फाँसी के फन्दे की तरफ जा रहा होऊँगा तब तुम मेरे लिये क्या कुछ कर सकते हो?”

वजीर का बेटा बोला — “हाँ हाँ जरूर। तुम खुश रहना।

ठीक समय पर मैं कमान्डर इन चीफ अपने सिपाहियों को इशारा करूँगा और वे राजा को मार देंगे।”

इसके बाद सुनार दीवान के घर गया और उसके सबसे बड़े बेटे से बहुत देर तक बातें करता रहा — “मेरे अच्छे दोस्त तुम मेरी रिहाई के लिये क्या कर सकते हो?”

नौजवान बोला — “तुम डरो नहीं। मैं तुम्हारी मेहरबानियों को नहीं भूल सकता। मैं ठीक समय पर आऊँगा और राजा को मार दूँगा।” गार्ड ने भी यह सब सुना तो वह तो डर के मारे काँप गया। इसके बाद सुनार अपने तीसरे दोस्त चोर के पास गया। उसने उससे भी वही सवाल किया जो उसने अपने पहिले दोनों दोस्तों से किया था। चोर ने उसकी नमस्ते का जवाब दिया और उसको कुछ देर बैठने के लिये कहा क्योंकि उस समय वह कोई बहुत जरूरी काम कर रहा था।

उसने सुनार की बात सुनी और महसूस किया कि सुनार बहुत कष्ट में है। उसने उसकी सहायता करने का इरादा किया हालाँकि इसमें उसकी जान का खतरा था।

वह उसी पल वहाँ से चला गया और राजा के महल की खिड़की से हो कर महल की छत पर चढ़ गया। वहाँ से फिर वह राजा के सोने के कमरे में चला गया और उस आदमी का सिर काट दिया जो उस रात वहाँ राजा की जगह सो रहा था।

यह करके उसने सोचा “अब सुनार को किसी बात का डर नहीं होना चाहिये।” यह सोच कर वह उस आदमी का सिर अपने हाथ में ले कर सुनार के पास दौड़ आया।

उसने वह सिर सुनार और गार्ड के सामने फेंकते हुए कहा — “यह लो। अब तुम्हारी सारी मुसीबतें खत्म हो गयीं। अब राजा तुम्हें बिल्कुल परेशान नहीं कर सकता।” इसके बाद सुनार गार्ड के साथ जेल में लौट आया।

अगले दिन वह सब लोगों और सिपाहियों के सामने फाँसी के फन्दे की तरफ ले जाया गया। जैसे ही वह फाँसी के चबूतरे के पास पहुँचा तो दीवान का बेटा अपनी तलवार खींच कर राजा को मारने के लिये आगे बढ़ा। उधर वजीर के बेटे ने भी अपनी सेना को इशारा किया कि वह इस काम में उसकी सहायता करे।

पर इस सबकी जरूरत ही नहीं थी क्योंकि राजा ने सोच रखा था कि उसको क्या करना है। वह चिल्लाया — “सुनार को छोड़ दो उसे आजाद कर दो। उसको माफ किया जाता है।”

इस पर वहाँ खड़े सब लोग चिल्ला पड़े — “राजा की जय हो। राजा अमर रहे।”

(सुषमा गुप्ता)

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