Wednesday, February 21, 2024
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घोड़ी और घुड़सवार : गुजरात की लोक-कथा

Ghodi Aur Ghudsawar : Lok-Katha (Gujrat)

मेथणी गाँव के चौपाल में एक दिन साँझ को काठियावाड के घोड़ों की बात चल रही थी। कोई माणकी का बखान कर रहा था तो कोई ताजण के पराक्रम कह रहा था। इसी प्रकार बेरी, फूलमाल, रेशम और वांदर्य’इत्यादि की बातें निकली थीं। एक आदमी हुक्के का कश लेते हुए बोला, “अरे बाप! जिस वक्त ऊँची नस्ल के घोड़े पर वैसा ही उच्चकुल का सवार चढ़ता है, उस घड़ी वह आकाश को भी छू लेता है, हाँ!”

एक चारण बैठा था, उसके होंठ मुसकरा रहे थे।

“क्यों भाई, क्यों हँस रहे हो, बहुत बड़े घुड़सवार लगते हो!”

“घुड़सवार तो मैं नहीं हूँ, पर वैसा ही एक सवार और वैसी ही जोड़ीदार घोड़ी मैंने देखी है।”

“भाई, तब तो सुनाओ न वो बात ! पर बात में बहुत मोयन मत मिलाना! जैसा देखा हो वैसा ही कह सुनाओ।”

चारण ने खोंखारी खाकर अपना गला साफ किया, फिर उसने दायरे से कहा, “भाई, देखा है वैसा ही कहूँगा, मोयन मिलाऊँ तो जोगमाया देखेंगी, किंतु चारण का लड़का हूँ, इसलिए शूरवीरता को प्रेम किए बिना तो नहीं ही रहा जाएगा।”

हुक्के की घूँट लेकर उसने बात आरंभ की।

बहुत नहीं, पच्चीस वर्ष हुए होंगे। सोरठ के इतरिया गाँव में सूथा घाघल नामक एक काठी रहता था। पचीस वर्ष की उम्र। घर का सुखी आदमी, इसलिए शरीर के रोम-रोम से मानो जवानी हिल्लोर मार रही है। विवाह को एक-दो वर्ष हुए होंगे। काठियारिन की गोद भर के पिहर में प्रसव के लिए ले गए हैं। लड़का जनमा है। दो महीने प्रसव के पूर्व और दो महीने प्रसव के बाद का, “इस तरह से चार-चार महीनों का वियोग हुआ। इसकी वेदना तो आपा सूथा के हृदय बिना दूसरा कौन समझ सकता है ?”

यह सब होते-होते आकाश में आषाढ़ी दूज दिखाई दी। इंद्र महाराज गेंद और दंडे खेलने लगे हों, इस प्रकार आषाढ़ गर्जने लगा। पहाड़ों पर चमकती हुई बिजली आकाश और धरती का विरोध निकालने लगी। काले घने बादल सात-सात तह जमकर आकाश में छा गए।

फिर तो बादलों के हृदय में वियोग की काली अग्नि जल रही हो, इस प्रकार बिजली आकाश के कलेजे को चीर-चीरकर धाँय-धाँय निकलने लगी। न जाने कितनी दूर सागर के किनारे मन का मीत बैठा होगा, उसको याद कर-कर के वियोगी बादल मन-ही-मन में धीरे-धीरे रोने लगे। मोर अपनी गरदन के तीन-तीन टुकड़े करके केहू…क! केहू…क! शब्दों से टहुकने लगे, “मोरनी ढेकूक…! ढेकूक…!” करते हुए स्वामीनाथ से लिपटने लगी। लताएँ वृक्षों को अँकवार में लेकर ऊपर चढ़ने लगीं। आपा सूथा आकाश में निरखा ही किया। उसका मन बहुत उदास हो गया। एक रात्रि तो उसने बिस्तर पर करवटें ले-लेकर निकाली। सुबह होते ही उसके धीरज की अवधि पूरी हो गई। अपनी माणकी घोड़ी पर सवार होकर आपा सूथा ससुराल के गाँव मेंकड़ रवाना हुआ।

मेंकड़े गाँव पहुँचकर आपा तुरंत जल्दीबाजी करने लगे, परंतु ससुराल में जमाईराज मेहमान होता है, वह तो पिंजरे में बंद तोते जैसा कहलाता है। उस तोते का छुटकारा अचानक कैसे होगा, उसमें भी बरसात आपा की वैरी हुई है। दिन-रात आकाश मूसलधार बरसने लगा। हाथी के सूंड जैसा परनाला घर की ओरियानी से बहने लगा। वह पानी की धार नहीं बरस रही थी, परंतु आपा के विचार से तो इंद्र महाराज की बरछियाँ बरस रही थीं। ससुर के घर तो अपनी कठियारिन के पैर का तलवा तो क्या ओढ़नी का किनारा भी नजर नहीं आता था! इसी तरह तीन दिन हो गए। आपा का मिजाज गया। उसने खुलेआम कह दिया कि “मुझको तो आज ही विदा करा के जाना है।”

सासू ने कहा, “अरे भाई! लगातार वर्षा हो रही है, इसमें कहाँ जाओगे?”

“कहीं भी–समुद्र में! मुझको तो आपके घर का पानी अभी से हराम है। मेरी बोआई व्यर्थ हो रही है।”

“आपकी कौन सी बोआई व्यर्थ हो रही थी ! हृदय की बोआई?”

गाँव का चौधरी आया। उसने कहा, “आपा! आपको पता है ? शेव्रुजी नदियों फैली पड़ी है। आज तीन-तीन दिन हो गए शेय्जी का पानी नहीं उतर रहा। चारों ओर जलबंबाकार हो गया है और आप कैसे शेजूंजी पार करेंगे?”

“वहाँ जो होगा सो सही, पर यहाँ से तो निकलने में ही छुटकारा है।”

“ठीक है, आज का दिन निकाल लीजिए। यहाँ का पानी हराम हो तो मेरा घर पवित्र कीजिए। कल सुबह चाहे जैसा भी मेघ बरसता होगा तो भी अपने ही बैलों को बाँधकर आपको इतरिया गाँव पहुँचा दूंगा।”

उस दिन आपा रुके। दूसरे दिन चौधरी छह बैलों को बाँधकर गाड़ी सहित हाजिर हो गया। आकाश में वर्षा के बादल घिरे हुए थे। सब ने जमाई के मुँह की ओर देखा, परंतु जमाई का हृदय नहीं पिघला। युवा काठियारिन सिर से स्नान करके धूप से सुगंधित किए गए कपड़ों को धारण की। बाल को कंघी करके दोनों तरफ भ्रमर के पंख जैसे काले सुगंधित सौगंधिक को लगाया। माँग में सुगंधित सिंदूर भरा। माता और दो महीने का बालक बैलगाड़ी में बैठे।”

मेकड़ा और इतरिया के बीच मेंकड़ा से ढाई कोस पर क्रांकच गाँव का सिवान, शेजी नदी बाढ़ की उफान में है। बिल्कुल गीर के पहाड़ों में से शेतल (शेजूंजी) का पानी चला आ रहा है, इसीलिए आठआठ दिन तक उसकी बाढ़ नहीं उतरती है। एक किनारे से दूसरे किनारे पर जाना हो तो मुसाफिरों को बेड़ा पर बैठकर नदी को पार करना पड़ता है।

बैलगाड़ी और माणकी का सवार शेत्रुजी के किनारे आकर रुक गए। बौराई शेतल गर्जना करती हुई दोनों किनारे से बह रही है। आज उसको जवानी से भरे इस काठी युगल पर दया नहीं आई। नदी के दोनों किनारों पर पानी के उतरने की राह देखते हुए यात्री कतारबद्ध होकर बैठे थे। मैं भी उस दिन शेतल के किनारे बैठा था और मैंने ये सब अपनी नजर से देखा। बेड़े वाले बेड़ों को बाँधकर चिलम फूंक रहे थे। सभी यात्री इस काठियारिन की ओर देखने लगे, “मानो संगमरमर की मूर्ति के सम्मुख देख रहे हों। जोगमाया की कसम-क्या वह रूप! यदि नदी को आँखें होती तो वह नाजुकता देखकर बाढ़ कम कर देती।”

आपा सूथा ने बेड़ावाले से पूछा, “उस पार ले जाओगे?”

कोणियों ने कहा, “दरबार नदी में उतरना ठीक नहीं है। देखो न, दोनों किनारों पर कितने आदमी बैठे हैं।”

पानी कब तक कम होगा ?”

“कुछ कहा नहीं जा सकता।”

बैलगाड़ी वाले चौधरी ने कहा, “आपा, अब विश्वास हुआ? अभी भी मान जाओ तो बैलगाड़ी वापस ले चलूँ।”

“अब वापस जाएँगे तो सासुमाँ इज्जत उतार लेंगी। वापस तो जाने से रहे, चौधरी!”

आपा के राग में माणकी उत्साह से थिरक रही थी। मानो अभी हाल ही पंख फैलाकर दूसरे किनारे पहुँच जाऊँगी, वह इस तरह से उछल रही थी। नदी की मस्त गर्जना के सम्मुख माणकी भी हिनहिनाने लगी। थोड़ा विचार करके घुड़सवार बेड़े वाले की ओर मुड़ा। “किसी तरह से उस पार उतारोगे?”

“कितने लोग हो?” लालची बेड़ेवालों ने हिम्मत की।

“एक औरत और एक बच्चा, बोलो क्या लोगे?”

“सोलह रुपए हों तो अभी उतार देंगे।”

“सोलह पूरे!” कहकर आपा ने कमर से रुपए की थैली खोलकर खन्न-खन्न करते हुए सोलह रुपए गिन दिए। मानो उस झनकार में आपा की आज की आनेवाली मध्यरात्रि की टंकार बजी हो। उसने पुकारा, “नीचे उतरो।”

काठियारिन नीचे उतरी। दो महीने के बालक को हृदय से लगाकर महिला ने धरती पर पैर रखे। क्या वे पैर थे! पैर के तलवे से मानो कुमकुम की ढेरी लगती जाती। कुसुंबी चादर के पतले घूघट से उसका मुँह दिख रहा था। काले-काले बादलों का काजल उतारकर मानो अंजित वे दो आँखें और उन आँखों के कोर गुंजा फल के रंग जैसे लाल चटक-सोने की शहनाई जैसी हाथ की कलाई ललाट पर हरे रंग का गोदना, बंसीधारी कान्ह और गोपी का वह मोर और सोने के दीपक में पाँच-पाँच ज्योति जल रही हो, ऐसी उसकी बाएँ-दाएँ हाथ की पाँच-पाँच अंगुलियाँ, मानो उस मूर्ति ने मुसाफिरों की नजर बाँध ली। सभी बोल उठे, “आपा, जुल्म क्यों कर रहे हो, ऐसा मनुष्य फिर नहीं मिलेगा हाँ! ये किंशुक सा बालक कुम्हला जाएगा। आपा, पछताओगे। चीखकर रोओगे।”

“जो होगा सो ठीक भाइयो! आप बीच में न बोलें।” आपा ने थोड़ा दिल को दु:खी करके उत्तर दिया। काठियारिन से कहा, “बैठ जाओ।”

बिना घबराए, बिना कुछ पूछे, ‘जै माता।’ कहकर काठियारिन बेड़ा पर बैठ गई। पालथी मारकर गोद में बालक का सुलाया। चूँघट निकालकर पैर के नीचे दबा दिया। चार तूंबड़ी और उस पर चक्की पीसने का छोटा सा खटोला रखकर तैयार किया गया बेड़ा। उसके मुँह के आगे मोटा सा मजबूत रस्सा बँधा होता है। उस रस्से को पकड़कर दो तैराक उस बेड़े को खींचते हैं। इस तरह वह बेड़ा तैरने लगा। आपा माणिकी को पकड़े हुए किनारे पर खड़े-खड़े देखते रहे। बेड़ा उस पार पहुँच जाए, फिर माणिकी को पानी में हलाऊँ और हलाते ही उस पार काठियारिन को पकड़ लूँ। इतने अडिग विश्वास से वे खड़े थे। माणकी को तो उन्होंने ऐसी कितनी बाढ़ में हलाया था और माणकी को भी मानो अपनी समवयस्क काठियारिन का अपने से आगे पानी को पार हो जाना देखा नहीं जा सकता हो, इस प्रकार टापों को पछाड़ने लगी। मानो उसके पैर के नीचे ज्वाला जल रही हो, इस प्रकार अधीरतापूर्वक खड़ी है।

बेड़ा शेतल की धार पर तैरने लगा। छोटा बच्चा नदी की लीला देखकर गरजते हुए उछलने लगा। माता ने बेड़ा के संतुलन को बचाते हुए बालक को दबाया, तब तक वे बीच धार में पहुँच गए थे।

“बुरा हुआ!” अचानक आपा के मुँह से उद्गार निकला। “गजब हो गया !” दोनों किनारे के लोगों ने मानो प्रतिध्वनि की।

लगभग एक सौ आँखें उस बेड़े पर लगी हुई थीं। एक लंबा काला नाग घबराते हुए बीच धारा में उड़ता हुआ आ रहा था। नाग पानी में बैचेन हो गया था। पानी की लहरें उसे बाहर निकलने नहीं दे रही थीं। वह बचने का साधन खोज रहा था। उसने बेड़ा देखा। अर्जुन की तरकश से तीर निकला हो, इस प्रकार पूरा शरीर संकुचित करके नाग छलाँग मारकर बेड़े पर आ चढ़ा, ठीक काठियारिन के मुख के सामने ही खड़ा हुआ। सूप की तरह फन काढ़े ‘फूँ’आवाज करता हुआ, वह काठियारिन के घूघट पर फन पछाड़ने लगा, परंतु वह तो काठियारिन थी! वह डरी नहीं! उसकी आँखें तो बालक पर नीचे लगी हुई हैं। उसके मुख से ‘जै माँ ! जै माँ !’ का जाप निकला।

“आपा, जुल्म हो गया।” आदमियों ने एक ही श्वांस में बोला। आपा तो ध्यानस्थ हो रहे। उन्होंने देखा नाग ने फन बटोरकर मुँह घुमा लिया। रस्से पर शरीर फैलाकर चला। आपा ने आवाज लगाई-ओ जवानो, सामने के किनारे तक रस्सा मत छोड़ना। हाँ, सौ रुपया दूँगा।”

बेड़ेवालों के कान में शब्द पड़े, यह क्या आश्चर्य है। सौ रुपए और पीछे मुड़कर देखते हैं तो काल और अपने हाथ के बीच में एक बित्ते का अंतर। ‘ओ बाप!’ चिल्लाकर उन्होंने हाथ से रस्सा छोड़ दिया। ‘ढब-ढब-ढबाक!’ पानी में डुबकी लगाते हुए दोनों जन किनारे निकल गए।

रस्सा छूट गया और बेड़ा उलटा। बीच धार में चक्कर खाई घररर! घरररररर! बेड़ा बह गया। ओ गया…ओ गया “कहर ढाया आपा, कहर ढाया।” ऐसा शोरगुल दोनों किनारों पर होने लगा। रस्से पर चढ़ा हुआ नाग पानी में डूबकी खाकर वापस बेड़ा पर आया। स्त्री के सामने फन काढ़ा। स्त्री की नजर के तार तो दूसरे किसी जगह नहीं, अपने बालक पर है और उसके अंतर के तार लगे हैं माताजी के साथ। बेड़ा बहती धारा में सीधा बहता जा रहा है। ‘जै जगदंबा’ का मृत्युजाप जपता जा रहा है।

आपा ने देखा कि काठियारिन बह गई। एक पल में तो उसने पत्नी के बिना संसार की कल्पना कर ली और-

डूंगर उपर दव बणे, खन-खन झरे अंगार।
जाकी हेडी हल गई, वाका बूरा हवाल॥
और….
कंथा पहेली कामनी, सांया म मायें।
रावण सीता ले गयो, वे दिन संभाएँ॥

इसी तरह की दहशत बैठ गई, परंतु विचार करने का वक्त कहाँ था?

काठी ने माणकी की लगाम निकालकर उसकी काठी के अगले सिरे से बाँधी। मोहरी भी उतार दी चमड़े की बग्घी को खींचकर तराजू पर तौलते हैं, इस प्रकार अंदाज लिया। ऊपर बैठ गया। नदी की सीधी धारा में माणकी को हाँक दिया। मन-मन भर माटी के पिंड उड़ाते हुए माणकी एक खेत जितना दूर पलक झपकते भर में ही पहुँच गई। ये सब बिजली की सी तीव्रता से हुआ।

“बाप माणकी! मेरी इज्जत रखना।” कहते हुए घोड़ी के बगल में एड़ी मारी। शेजूंजी के ऊँचे-ऊँचे कगारों से आपा ने माणकी को पानी में कुदाया। ‘धुब्बांग’ से दस हाथ दूर माणकी जाकर गिरी। चारों पैर लंबे करके वह पानी में तैरने लगी। पानी की सतह पर केवल माणकी का मुँह और घुड़सवार की छाती, इतना ही भाग दिखता था। माणकी पहुँची। ठीक मध्यधार में बेड़ा तिरछा झुक गया। बेड़ा पलट जाने में पल भर की देरी थी। आपा के हाथ में नंगी तलवार थी। ठीक बेड़े के पास आते ही आपा ने तलवार चलाई। ‘डुफ’ से नाग का सिर कटकर नदी में जा गिरा। पलक झपकते ही आपा ने रस्सा हाथ में थाम लिया।

“अद्भुत आपा! वाह आपा!” नदी के दोनों किनारों से लोगों ने ललकारा। शरारती नदी ने भी मानो शाबाशी दी हो, इस प्रकार दोनों कगारों से प्रतिघोष हुआ।

चारों दिशाओं से राक्षस की भाँति लहरें उछल रही हैं। काठियारिन और बालक पानी में डूब रहे हैं।

माँ-बेटे के मुँह में भी पानी जा रहा है। आपा ने बहाव की उलटी दिशा में नजर की तो किनारा आधा कोस दूर रह गया था। घोड़ी पानी के विरुद्ध नहीं चल पाएगी। सामने नजर डाली तो नदी की ऊँची-ऊँची कगारें हैं, बाहर कैसे निकल पाएँगे?”

“बाप माणकी बेटा माणकी!” कहते हुए आपा ने घोड़ी की पीठ थपथपाई। घोड़ी चल दी।

“काठियारिन, अब तुम्हारा जीवन रस्से पर है, इसलिए ठीक से पकड़ना।” काठी ने कहा।

काठियारिन ने बालक को पलाथी में दबाया, दोनों हाथों से रस्सा पकड़ा। रस्से की छोर आपा ने काठी के सिरे से फँसाया। माणकी किनारे के पास पहुँच गई उसके पैर माटी पर टिके।

“काठियारिन ! ठीक से पकड़ना!” कहकर आपा ने माणकी के बगल में लात डाला। चारों पैर समेटकर माणकी ने उन ऊँचे-ऊँचे कगारों को लाँघ गई, परंतु कगारें भीगी हुई थीं। माटी का एक गाड़ी जितना भाग फसक गया। माणकी वापस पानी में जा गिरी। बेड़ा भी, बालक और माता सहित फिर से पानी में गिरा। माँ-बेटा घबराकर पुनः होश में आए।

“बापा माणकी!” कहकर फिर से कगार के पास जाकर आपा ने कुदाया। ऊपर जाकर फिर से माणकी पानी में गिर पड़ी। मानो भोग लेने के लिए भूत मंडली जैसी लहरें दौड़ी आ पड़ीं।

तीसरी बार जब माणकी गिरी, तब काठियारिन ने कहा, “काठी, बस अब बेड़ा छोड़ दो! अपना जीवन बचा लो। शरीर सुरक्षित रहेगा तो दूसरी काठियारिन और दूसरा लड़का मिल जाएगा। अब परिश्रम मत करो।”

“बोलो मत! ऐसा अशुभ मत कहो! निकलेंगे तो चारों जीव साथ में निकलेंगे, नहीं तो चारों जन जल-समाधि लेंगे। आज की रात रहने की प्रतिज्ञा है या तो इतरिया के घर या फिर समुद्र के पाताल में।”

“माणकी! बाप! यहाँ पर दूर रखेगी क्या?” कहकर चौथी बार एड़ी लगाई। माणकी तीर की भाँति निकली। कगार के ऊपर जा गिरी। कुआँ में से चरसा-मोट निकलती है, वैसे काठियारिन और उसके बालक सहित बेड़ा सुरक्षित किनारे निकल गया। ‘बहुत खूब आपा! अद्भुत घोड़ी!’ ऐसा चिल्लाते हुए लोग उसे घेरने लगे। आपा माणकी को पवन डुलाने लगे, परंतु माणकी को अब पवन की आवश्यकता नहीं थी। उसकी आँखें निकल गई थीं, उसके पैर टूट गए थे, उसके प्राण पखेरू उड़ गए थे।

सिर पर सच में सोने के मुल्लमा वाला फेंटा बाँधा था। उसे उतारकर सूथा घाघल ने माणकी के शव पर ढक दिया। माणकी को आलिंगन में लेकर खुद चीख-चीखकर रोए। बाप माणकी! माणकी! ऐसी पुकारकर करके आपा ने आकाश को रुलाया। वहीं-के-वहीं जल लेकर प्रण लिया कि जीतेजी अन्य किसी घोड़े पर नहीं चढंगा। काठियारिन के नेत्रों से भी आठ-आठ आँसू बह निकले थे।

अस्सी साल का होकर वह काठी मरा। उसके भानजे देवा खाचर के घुड़साल में बारह-बारह ऊँची नस्ल के घोड़े थे, पर स्वयं कभी घोड़े पर नहीं चढ़ा।

“अद्भुत घोड़ी, बहुत से करतब!” ऐसा कहकर पूरे दायरे ने कान पकड़ लिये।

(घोड़ी के पैर टेकते समय बेड़ा और उस पर बैठे बालक-माता तीन-तीन बार किस तरह से साथ रह सकते हैं, ऐसी शंका मित्रों ने उठाई है। उसका निराकरण करने के लिए वह नजरों से देखनेवाला कहानीकार आज उपस्थित नहीं है, इसलिए हम सुखपूर्वक समझ लें कि घुड़सवार काठियारिन को बालक समेत घोड़ी पर पीछे बैठाकर पराक्रम किया होगा।)

-झवेरचंद मेघाणी

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