Thursday, February 29, 2024
Homeलोक कथाएँकेरल की लोक कथाएँदुष्ट शेर : केरल की लोक-कथा

दुष्ट शेर : केरल की लोक-कथा

Dusht Sher: Lok-Katha (Kerala)

एक अय्यर ब्राह्मण घने वन से गुजर रहा था। तभी उसकी नजर पिंजरे पर पड़ी। पिंजरे में एक शेर बंद था। शेर ने ब्राह्मण से विनती की-‘आप मुझे पिंजरे से निकाल दें। भूख-प्यास से मेरी जान जा रही है। मैं कुछ खा-पीकर पुनः पिंजरे में लौट आऊंगा।’ ब्राह्मण महाशय परेशान हो गए। यदि पिंजरा खोलते हैं तो शर उन्हें खा सकता है। यदि नहीं खोलते हैं तो बेचारा पशु मारा जाएगा। अंत में उनकी दयालुता की जीत हुई। उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया।

शेर बाहर आते ही गरजकर बोला-‘मूर्ख मनुष्य, तूने गलती की है। उसकी सजा भुगत। मैं तुझे ही खाऊंगा।’ ब्राह्मण भय के कारण थर-थर कांपने लगा। परंतु मन-ही-मन वह बचने का उपाय भी सोच रहा था। जैसे ही शेर ने झपट्टा मारने की कोशिश की, ब्राह्मण ने हिम्मत बटोरकर कांपते स्वर में कहा, खाने से पहले मुझको चार लोगों से सलाह लेनी हैं-

यदि वे कहें कि
यही न्याय है
तो मैं स्वयं काटूंगा
अपने गला।

अब जंगल में और लोग कहां से आते? चार वन्य प्राणियों से राय लेने का निश्चय हुआ। एक बूढ़ा-सा ऊंट सामने से गुजरा तो उससे राय पूछी गई। वह मुंह बिचकाकर बोला-‘अरे ये इंसान कहीं दया के योग्य होते हैं? मेरे मालिक को ही देखो, मैं जवान था तो खूब काम करता था। अब शरीर में ताकत नहीं है तो वह मुझे डंडों से मारता है।’ शेर की आंखें खुशी से चमकनें लगीं। किंतु अभी तीन जजों की सलाह और लेनी थी।

पास में ही बरगद का विशाल वृक्ष था। उसे भी अपने मन की भड़ास निकालने का अवसर मिल गया। लंबी बांहें फैलकर बोला- ‘मनुष्य बहुत लोभी होता है। सूरज की तपती धूप से मैं इसकी रक्षा करता हूं। सारी दोपहर मेरी छांव में बिताकर यह शाम को मेरी टहनियां काटकर ले जाता है। मेरी राय में तो सभी मनुष्यों को जान से मार देना चाहिए।’ यह उत्तर सुनकर ब्राह्मण की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

तभी ढेंचू-ढेंचू की आवाज सुनाई दी। ब्राह्मण को कुछ आशा बंधी। एक लंगड़ा गधा रेंकता हुआ उसी ओर आ रहा था। शेर ने उनसे भी प्रश्न किया। क्या वह ब्राह्मण को खा सकता है? गधेराम तो पहले से ही जले-भुने बैठे थे। शायद अभी पिटाई खाकर आ रहे थे। गुस्से से भरकर बोले-‘देखो न, मैं दिन-भर मालिक का बोझा ढोता हूं। मैं उफ तक नहीं करता। जो भी रूखा-सूखा मिल जाता है, वह खुशी से खा लेता हूं पर आज….। कहकर वह रोने लगा।’ शेर को गधे से क्या लेना-देना था? उसने अपना प्रश्न दुहराया, ‘क्या ब्राह्मण को खा लूं?’ गधे ने आंसू पोंछकर कहा- ‘अवश्य मेरे मित्र, इसे बिलकुल मत छोड़ना। इन मनुष्यों ने हमारी नाक में दम कर रखा है।’

अब एक ही पशु की राय और लेनी थी। शेर की निगाहें तेजी से इधर-उधर दौड़ने लगीं। एक लोमड़ी वहीं खड़ी होकर सब कुछ देख रही थी। वह पास आई और बोली- ‘फैसला तो मैं कर दूंगी पर पहले अपने-अपने स्थान पर खड़े हो जाओ। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि इतना बड़ा शेर पिंजरे में कैसे समा गया? शेर ने जोश में आकर छलांग लगाई और पिंजरे में जा पहुंचा।

लोमड़ी ने झट से दरवाजा बंद कर दिया और ब्राह्मण से बोली, ‘आप अपने घर जाएं और जंगली पशुओं से बचकर रहें। इस शेर की हरकतों से तंग आकर ही इसे बंद किया गया था। आगे से बिना सोचे-समझे कोई काम मत करना।’ ऐसा कहकर लोमड़ी जंगल में लौट गई।

दुष्ट शेर ने पिंजरे में ही भूख-प्यास से दम तोड़ दिया। उसे उसके किए की सजा मिल गई थी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments