Thursday, February 29, 2024
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शबरंग राजकुमार और चोर : कश्मीरी लोक-कथा

Shabrang Rajkumar Aur Chor : Lok-Katha (Kashmir)

यह बहुत पुरानी बात है कि एक बार काश्मीर में एक राजा राज करता था। उसको शिकार का बहुत शौक था। एक दिन जब वह जंगल में कुछ दूर शिकार करने गया तो उसको एक ऐसा जानवर मिल गया जिसको वह मारना चाहता था। सो वह उसके पीछे भाग लिया और इतनी तेज़ भागा जैसे कि वह पहले कभी नहीं भागा था और शायद फिर कभी भागेगा भी नहीं।

उसने उस जानवर को बार बार मारने की कोशिश की पर हर बार उसका निशाना चूक गया। वह उसको मारने के लिये उतावला हो रहा था जिसकी वजह से वह उसके पीछे और तेज़ भागा। वह उसके पीछे इतनी दूर तक भागा कि उसके नौकर उससे बहुत पीछे छूट गये। वे इतने पीछे छूट गये कि न तो वे उसको दिखायी ही दे रहे थे और न ही उनको वह सुन सकता था।

आखिरकार भागते भागते वह थक गया और और आगे न भाग सका सो वह रुक गया। उसने देखा कि वह तो एक बहुत सुन्दर बागीचे में निकल आया था। उस बागीचे के साथ साथ ही एक सड़क जाती थी जिस पर एक लड़की अकेली चली जा रही थी। राजा उसको देख कर बोला — “यकीनन शादी के बाद तुम्हारे जैसी पत्नी को मैं यहाँ जंगल में अकेली छोड़ सकूँगा।”

लड़की कुछ गुस्से से बोली — “क्या सचमुच। मैं किसी तुम जैसे से शादी करूँगी उससे एक बेटा पैदा करूँगी जो तुम्हारी ही बेटी से शादी करेगा।”

उसके इस तुरत और होशियार जवाब से राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह बागीचा छोड़ कर अपने घर चला गया। अपने घर आ कर उसने उस सुन्दर लड़की के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की।

कोई भी उसके बारे में कुछ भी नहीं बता सका सो उसने अपना एक आदमी उसके बारे में पता लगाने के लिये भेजा। उस आदमी ने आ कर बताया कि वह लड़की कोई राजकुमारी थी और अक्सर ही उस बागीचे में जाया करती थी जहाँ राजा ने उसको देखा था क्योंकि उस बागीचे में बहुत सुन्दर फूल खिले थे क्रिस्टल के फव्वारे लगे थे और सुन्दर छायादार पेड़ थे।

जब काश्मीर के राजा ने यह सुना तो वह बोला कि वह उसी से शादी करेगा। उसने अपने कुछ आदमियों को जो शादी कराने में बहुत होशियार थे तुरन्त ही इस शादी को पक्का करने के लिये भेज दिया।

वे आदमी तुरन्त ही चल दिये और जैसे ही वे राजकुमारी के देश पहुँचे तो उन्होंने वहाँ के राजा से मिलने की इच्छा प्रगट की। वहाँ पहुँच कर उन्होंने उसको झुक कर प्रणाम किया और कहा कि हम अपने राजा की तरफ से एक खास वजह से आपके पास आये हैं। वह वजह हम आपको सबके सामने नहीं बता सकते। हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमसे अकेले में बात करें जहाँ केवल आप और आपके महामन्त्री जी हों।

राजा राजी हो गया और उसने तुरन्त ही सबसे वहाँ से जाने के लिये कहा। जब राजा और उसका महामन्त्री वहाँ रह गये तो उन आदमियों ने एक बार फिर उसको सिर झुका कर कहा — “ओ महान राजा भगवान आपकी उम्र लम्बी करे। आपके देश में हमेशा शान्ति रहे आपका राज्य धनवान रहे और आपके सारे दुश्मन आपसे दूर रहें।

हमको हमारे काश्मीर के भले और कुलीन राजा ने अपने लिये आपकी बेटी के रिश्ते के लिये भेजा गया है जिसकी सुन्दरता के चर्चे दूर दूर तक फैले हुए हैं। वह उसकी सुन्दरता और उसके गुणों को जानते हैं। उनको दिन रात चैन नहीं है जब तक कि आप उनकी इच्छा पूरी न कर दें। हमारे राजा की अच्छाइयाँ ताकत और धन सम्पत्ति तो आपसे छिपी नहीं है।

हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप इस शादी की इजाज़त दे कर हमको यहाँ से जाने की इजाज़त दें।”

राजा थोड़ी देर रुक कर बोला — “तुम लोगों ने जो कुछ कहा वह मैंने सुना। मैं कल तुम्हारी बात का जवाब दूँगा।” अगले दिन उसने अपनी पत्नी और वजीर से सलाह की। दोनों ने उस रिश्ते के लिये हामी भर दी तो उसने उन आदमियों को बुलवाया और उनसे कहा कि वे अपने राजा से कह दें कि हमें उनका रिश्ता मंजूर है। ठीक समय पर दोनों की शादी कर दी जायेगी।

जब काश्मीर के राजा ने अपने आदमियों से यह समाचार सुना तो वह तो खुशी से पागल सा हो गया और उसने उन आदमियों को बहुत सारी भेंटें दीं।

कुछ दिनों बाद राजकुमारी के पिता ने राजा को बुला भेजा। अच्छा दिन करीब ही था सो राजा को तुरन्त ही बुला लिया गया। राजा ने अपने साथ अपने कुछ अक्लमन्द मन्त्री और दरबारी लिये कुछ सेना ली बहुत सारे चमकीले रंग के कपड़े पहिने लोग लिये कीमती घोड़े लिये जिन पर बहुत सारी भेंटें लदी थीं और राजकुमारी के देश चल दिया।

बिना किसी खास घटना के वह राजकुमारी के देश पहुँच गया जहाँ राजकुमारी के पिता ने उसका बहुत अच्छा स्वागत किया। एक दो दिन बाद ही राजा की शादी हो गयी। कहने की बात नहीं कि राजा की शादी बहुत ही शानदार तरीके से हुई। राजा का महल ऐसा लग रहा था जैसे कि सोने चाँदी और जवाहरात का ढेर पड़ा हो।

भिखारियों को बहुत सारा चावल दान में दिया गया जो वहाँ देश के कई हिस्सों से आये थे। दुलहा और दुलहिन दोनों ही बहुत सुन्दर लग रहे थे। सब काम बड़े शानदार तरीके से हो गया सभी लोग बहुत खुश थे।

शादी के बाद राजा अपनी रानी के साथ अपने घर आ गया। घर आ कर उसने अपनी नयी रानी को अपनी दूसरी रानियों के साथ अपने जनानखाने में रख दिया। पर यह बड़ी अजीब सी बात हुई कि ये कुछ दिन उसने बिना अपनी रानी को देखे और बिना बात किये हुए ही निकाल दिये।

रीति रिवाजों के अनुसार कुछ दिनों बाद राजकुमारी के पिता ने राजकुमारी को अपने घर बुला भेजा। राजकुमारी अपने पिता के घर चली गयी। वह वहीं रही। उसने अपने पति के इस अजीब से व्यवहार के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा सिवाय अपनी माँ के। हालाँकि उसने अपनी माँ को सब कुछ बतला दिया था यहाँ तक कि वह बागीचे वाली घटना भी। साथ में उसने यह भी कहा कि उसे लगता है कि राजा ने गुस्से में आ कर उसके साथ ऐसा व्यवहार किया है।

माँ बोली — “तुम चिन्ता मत करो। सब कुछ ठीक हो जायेगा। थोड़ा इन्तजार करो।”

जब राजकुमारी को अपने पिता के घर में रहते रहते तीन साल हो गये और काश्मीर के राजा ने अपनी पत्नी के बारे में कोई पूछताछ नहीं की तो राजकुमारी अपने पिता के पास गयी और उससे उसने यात्रा पर जाने की इच्छा प्रगट की कि वह घूमने जाना चाहती है। उसके साथ में जाने के लिये एक वजीर और कुछ सिपाही दे दिये जायें ताकि वह अपनी हैसियत के अनुसार यात्रा कर सके।

राजा ने पूछा — “तुम कहाँ जाना चाहती हो और क्या करना चाहती हो?”

राजकुमारी बोली — “मैं दूसरे देश घूमना चाहती हूँ खास करके आपके आधीन जो राज्य हैं वे राज्य। और यह काम मैं आसानी से और खुशी खुशी कर सकूँ इसके लिये आपकी सहायता चाहती हूँ।”

राजा ने आश्चर्य से कहा — “पर तुम एक स्त्री हो जवान हो और सुन्दर हो। ऐसे तुम यह यात्रा कैसे कर सकती हो। जब लोग तुमको बिना तुम्हारे माता पिता के देखेंगे तो वे सब आश्चर्य करेंगे। नहीं नहीं यह ठीक नहीं है मैं तुम्हें इस यात्रा की इजाज़त नहीं दे सकता। अगर मैं ऐसा करूँगा तो यह मेरी बहुत बड़ी गलती होगी।”

राजकुमारी बोली — “तब फिर मैं बिल्कुल अकेली ही चली जाऊँगी क्योंकि मैंने जो कुछ ठान लिया है वह तो मैं करके ही रहूँगी।”

राजा कुछ दुखी हो कर बोला — “उफ़ अगर ऐसा है तो मुझे हाँ करनी ही पड़ेगी। पर तुम यह जान लो कि यह सब तुम्हें तुम्हारे अपमान और मौत की तरफ ले जायेगा जिसको सुन कर मुझे बहुत तकलीफ पहुँचेगी। फिर भी मैं कहूँगा कि तुम पास के देशों में ही जाना बहुत दूर मत जाना।”

राजकुमारी ने इस बात का वायदा किया और वहाँ से चली गयी। उसके जाने के बाद राजा ने अपना एक बहुत भरोसे का वजीर बुलाया और उसको राजकुमारी का प्लान बता कर कहा कि वह उस पर और उसके घूमने पर ठीक से नजर रखे।

कुछ दिन बाद राजकुमारी वहाँ से चल दी। उसके साथ राजा का वह भरोसे वाला वजीर था बहुत सारे सिपाही थे और नौकर चाकर थे।

सबसे पहले वह एक बहुत छोटे से देश में गयी जिसका राजा उसके पिता के आधीन था। सुनते ही कि बड़े राजा की बेटी आयी है वह उससे मिलने गया और उसको बड़ी इज़्ज़त के साथ उसको अपने राज्य में ले कर आया। उसके स्वागत में उसने एक बहुत बड़ी दावत का भी इन्तजाम किया।

राजकुमारी वहाँ कुछ दिन ठहरी और फिर अपनी यात्रा पर चल दी। इस तरह से उसने अपने राज्य के बराबर लगे हुए करीब करीब सारे देश घूम लिये और उन राजाओं और उनके राज्यों के बारे में जान लिया।

आखिर वह अपने पति के देश काश्मीर आ पहुँची। उसने उस देश को भी देखना चाहा – उसका दरबार उसका बाजार उसका व्यापार और भी कुछ जो उसके जानने लायक था।

सो उसने उस राजा को एक सन्देश भेजा कि वह उस राजा की बेटी है जिसको पहले कभी वह टैक्स दिया करता था। अभी वह शहर की दीवार के बाहर इन्तजार कर रही है और उस शहर को देखना चाहती है।

काशमीर के राजा को जब यह सन्देश मिला तो उसने अपने वजीर और कुछ दूसरे लोगों को बुलाया और जहाँ राजकुमारी के डेरा पड़ा हुआ था उस तरफ तुरन्त ही रवाना हो गया। आदर सहित वह उसको अपने महल में ले आया और अपने खास मेहमान के लिये उससे जो कुछ सबसे अच्छी मेहमाननवाजी हो सकती थी की। उसको एक खास महल में ठहराया गया जिसकी दीवारों पर दुनियाँ के बेहतरीन कपड़े सजे हुए थे। जिसके फशपर कीमती कालीन बिछे हुए थे। उसको सबसे स्वादिष्ट खाना पेश किया गया। शाही नौकरों को हुकुम था कि वे वहाँ हमेशा वहीं उसके पास ही रहें। कभी उसको अकेला न छोड़ें।

इतना अच्छा इन्तजाम देख कर तो राजकुमारी दंग रह गयी और बहुत खुश हुई। शाम को उसने राजा को इस सबके लिये बहुत बहुत धन्यवाद दिया और राजा से वायदा किया कि वह अपने पिता को इस बारे में सब कुछ बतायेगी।

अगले दिन बातों के बीच उसने काशमीर के राजा से कहा — “मैं आपसे अकेले में कुछ बात करना चाहती हूँ। आप कमरे में आइये।”

राजा ने सोचा कि शायद यह मेरे राज्य के सम्बन्ध में बड़े राजा का कुछ सन्देश लायी होगी जो इसे मुझे देना होगा सो वह कमरे में चला गया। पर इधर क्या था कि राजकुमारी को उससे प्यार हो गया था सो यही कहने के लिये उसने उसको अकेले में बुलाया था ताकि वह उसको वहाँ जब तक राजकुमारी का जी चाहे रहने की इजाज़त दे दे और बराबर उससे मिलता रहे।

उसकी सुन्दरता और अच्छा व्यवहार देख कर राजा ने उसको इस बात की इजाज़त दे दी। अब वह अक्सर उसके पास आने लगा। इस तरह कई

महीने बीत गये।

एक दिन राजकुमारी ने अपने देश जाने की इच्छा प्रगट की। उसकी दलील यह थी कि उसको और भी कई काम थे जिनको उसे करना था इसलिये वह अब जाना चाहती थी। फिर भी उसने वायदा किया कि वह जल्दी से जल्दी काश्मीर लौटेगी।

अपने प्यार की याद के लिये उसने राजा को अपनी एक अँगूठी दे दी और उससे उसकी एक अँगूठी और रूमाल माँगा। राजा ने उसको अपनी अँगूठी और रूमाल दे दिया और उसे चूम लिया। राजकुमारी ने काश्मीर छोड़ा और तुरन्त ही अपने देश लौट आयी। उसको सही सलामत वापस आया देख कर सभी लोग बहुत खुश थे। राजा तो उसकी यात्रा का हाल सुनने के लिये बहुत ही उतावला हो रहा था। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह उसकी इन देशों की यात्रा से बहुत खुश था।

रानी यानी उसकी माँ तो इसी बात से बहुत खुश थी कि उसकी बेटी को बच्चे की आशा हो गयी थी। उसने उन सबको मिलाने के प्लान भी बनाने शुरू कर दिये थे। समय पर राजकुमारी ने एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम शबरंग रखा गया।

जब राजा ने इस लड़के के जन्म के बारे में सुना तो वह बहुत नाराज हुआ क्योंकि उसने सोचा कि उसकी बेटी कहीं कुछ गलत काम करके आयी है।

वह चिल्लाया — “यह सब उसकी बेहूदा इच्छाओं का नतीजा है। मुझे इतना भी बेवकूफ नहीं होना चाहिये था कि मैं उसको इस तरह जाने की इजाज़त देता। इसका तो चरित्र ही खराब हो चुका है। अब इसका पति इसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा और मेरी भी बदनामी होगी। उफ़ इस सबको देखने से तो अच्छा था कि मैं मर जाता।”

राजा की तेज़ आवाज सुन कर रानी वहाँ आयी और बोली — “ऐसी बात नहीं है। तुमने तो मुझसे पूछा ही नहीं कि इस बच्चे का पिता कौन है। जो इसका पिता होना चाहिये वही इसका पिता है। और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ हे जिससे तुम्हारी या तुम्हारी बेटी की बदनामी हो।

जब यह देश घूमने गयी थी तब यह अपने पति के देश भी गयी थी। उस समय यह अपने आपको एक दूसरी लड़की बता कर उसके महल में रही। वहीं इसने उसका प्रेम जीत लिया। इससे जब यह वहाँ से चली तो राजा बहुत दुखी हो गया। और अब इसने उसके बच्चे को जन्म दिया है।

इसकी यात्रा का यही उद्देश्य था और इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिये इसने तुमसे घूमने की इजाज़त चाही थी।”

यह सुन कर राजा का दुख और गुस्सा दोनों एकदम से ही गायब हो गये। उसके परिवार में एक बेटा पैदा हुआ इसकी खुशी से ही सारा परिवार खुशी से भर गया और उसने अपनी बेटी की चतुराई और प्रेम की बहुत बड़ाई की।

धीरे धीरे बच्चा बड़ा होने लगा। दिनों दिन वह सुन्दर और होशियार होता जाता था और नयी नयी बातें सीखता जाता था। उसको सारी कलाओं और विज्ञान की शिक्षा दी गयी। वह बहुत बहादुर था और तलवार बहुत अच्छी चलाता था।

राजा अपने धेवते से बहुत खुश था। उसने घोषणा की कि वह अब उसके वजीरों का सरदार बन सकता था। और फिर कुछ सालों बाद अगर उसके पिता ने उसको स्वीकार नहीं किया तो उसको वह अपनी राजगद्दी दे देगा।

मगर उसकी माँ यानी राजकुमारी उसको एक चोर बनाने की जिद पर अड़ी थी। वह सोचती थी कि इस तरह की ट्रेनिंग से उसको अन्दर वे सब होशियारियाँ आ जायेंगी जिनकी उसको अपना उद्देश्य पूरा करने की जरूरत थी।

सो देश का एक सबसे बड़ा चोर बुलाया गया और उसको हुकुम दिया गया कि वह अपने हुनर की सारे भेद उसको सिखा दे। अगर राजा और राजकुमारी आदि उसकी कला से सन्तुष्ट हुए तो उसको भारी इनाम दिया जायेगा।

चोर ने कहा कि वह उसको अपनी कला के सारे भेद सिखाने की पूरी कोशिश करेगा और उसे आशा है कि कुछ ही महीनों में वह उसको दुनियाँ का सबसे बड़ा चोर बना देगा।

राजकुमारी बोली — “मैं खुद देखूँगी कि जो तुम कह रहे हो वह सच है कि नहीं। अगर शबरंग फलाँ फलाँ पेड़ पर चढ़ सका और वहाँ से बाज़ के बिना जाने उसके अंडे चुरा सका तब मैं मानूँगी कि तुमने उसको ठीक से चोरी करना सिखाया है।”

चोर शबरंग को ले गया और उसको चोरी को सारे हुनर सिखा दिये फिर वह उसको शाही महल में ले कर आया और बोला — “जाओ और अपनी माँ की इच्छा पूरी करो।”

शबरंग तुरन्त गया और पल भर में ही उस पेड़ पर चढ़ गया जिस पर एक बाज़ अपने अंडे से रही थी। उसने इस होशियारी से बाज़ के नीचे हाथ डाल कर उसके अंडे चुरा लिये कि उसको पता ही नहीं चला। वह तो बहुत देर तक शान्त और बिना हिले डुले ही बैठी रही। शबरंग पेड़ से उतरा और उसके अंडे ला कर अपनी माँ को दे दिये।

राजकुमारी ने फिर एक मजदूर जो अपने घर की तरफ जा रहा था की तरफ इशारा करते हुए कहा — “बहुत अच्छे। पर शबरंग अब तुम जाओ और उस आदमी का पाजामा ले आओ।”

शबरंग तुरन्त ही वहाँ से चल दिया और एक मैदान के चारों तरफ चक्कर काट कर उसी रास्ते पर जिस पर वह आदमी जा रहा था उससे कुछ दूर जा कर बैठ गया और एक पेड़ के ऊपर की तरफ बड़े ध्यान से देखने लगा।

जब वह मजदूर पास आया तो हालाँकि उसका इस बात से कोई मतलब नहीं था फिर भी उत्सुकता से उसने पूछा — “अरे तुम ऐसे ऊपर क्या देख रहे हो?”

शबरंग बोला — “मैं भी कैसा बदनसीब आदमी हूँ। मेरी मूँगे की माला इस पेड़ के ऊपर है। मैं उससे खेल रहा था कि खेल खेल में ही वह ऊपर जा कर लटक गयी। क्या तुम मेरी वह माला वहाँ से उतार दोगे। मैं तुम्हें दो रुपये इनाम दूँगा।”

“हाँ हाँ क्यों नहीं।” कह कर वह आदमी पेड़ के ऊपर चढ़ गया और शबरंग की बतायी गयी डाली की तरफ ऊँचे और ऊँचे चढ़ता गया। शबरंग ने सोचा था कि वह मजदूर पेड़ पर चढ़ने से पहिले अपना पाजामा उतार देगा पर उसने तो अपना पाजामा नहीं उतारा। उसने कहा कि उसको पाजामा उतारने की कोई जरूरत ही नहीं है।

सो अब शबरंग की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। वह अपनी माँ के पास खाली हाथ तो लौट नहीं सकता था। उसके हाजिर दिमाग ने काम किया। उसको एक सरकंडा मिल गया तो उसने उसका एक सिरा चींटियों के घर की तरफ कर दिया जिससे काफी सारी चींटियाँ उसमें भर गयीं। फिर उस सरकंडे को ले कर वह उस मजदूर के पीछे पीछे पेड़ पर चढ़ता रहा जब तक वह उससे एक दो गज की दूरी पर पहुँचा। मजदूर ने उसको अपने पीछे आते हुए देखा नहीं क्योंकि पेड़ घना था और चिड़ियों का और हवा का शोर मच रहा था।

मौका देख कर शबरंग ने उस सरकंडे का एक सिरा मजदूर के पाजामे में घुसाया और दूसरा सिरा अपने मुँह से लगा कर उसमें से हवा छोड़ दी। इससे उसमें भरी सारी चींटियाँ उसके पाजामे में घुस गयीं।

एकाध मिनट में ही बेचारे मजदूर की टाँग में खुजली मचने लगी। उसने नीचे झुक कर देखा तो उसकी टाँग पर तो चींटियाँ ही चींटियाँ थीं। उसको लगा कि जब वह पेड़ पर चढ़ रहा होगा तो किसी चींटी के घर से टकरा गया होगा। खैर अब तो वे वहाँ थीं सो उसने अपने पाजामे का नारा खोल दिया और उसे नीचे गिरा दिया।

यह देख कर शबरंग बहुत खुश हुआ। वह जल्दी जल्दी नीचे उतरा उसका पाजामा उठाया और उसको अपनी माँ के पास ले गया। राजकुमारी पाजामा देख कर बहुत खुश हुई और मास्टर चोर की तारीफ करते हुए बोली — “तुमको तुम्हारे गुरू ने बहुत अच्छा सिखाया है। अब मुझे तुम्हारे लिये कोई डर नहीं है।”

उसने मास्टर चोर को बहुत कीमती भेंट दी और उसको विदा किया।

कुछ दिन बाद ही एक दिन जब शबरंग कुछ और नौजवानों के साथ बागीचे में खेल रहा था एक नौजवान ने उससे पूछा कि तुम्हारा पिता कौन है। शबरंग को यह पता नहीं था सो यह सुन कर शबरंग बहुत गुस्सा हुआ और आश्चर्य में पड़ गया। वह तुरन्त ही खेल छोड़ कर अपनी माँ के पास आया और हाँफते हुए उससे पूछा —

“माँ बताओ मेरे पिता कौन हैं।”

राजकुमारी बोली — “बेटा तुम काश्मीर के राजा के बेटे हो जिनसे मेरी शादी हुई थी पर उन्होंने मुझे बड़ी बेरहमी के साथ छोड़ दिया।”

शबरंग बोला — “पर माँ यह सब तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? और मेरे नाना ने तुम्हारी इस बेइज़्ज़ती का बदला अपनी तलवार से क्यों नहीं लिया?”

राजकुमारी बोली — “जल्दी करने की जरूरत नहीं है। और अगर दूसरे साधन हाथ में हों तो किसी को घायल करने या मारने की भी बिल्कुल जरूरत नहीं है। अब तुम बहुत ही चतुर और होशियार बच्चे हो गये हो।

तुम अब अपने पिता के देश जाओ और वहाँ जा कर अपने पिता के प्रिय बन जाओ ताकि वह तुम्हें किसी ऊँचे ओहदे पर नियत कर दें और अपनी बेटी की शादी तुमसे करने के लिये तैयार हो जायें।

जब बात यहाँ तक पहुँच जाये तब तुम मुझे बुला लेना। मैं आ कर राजा को सब बातें बताऊँगी जिससे उनको यह विश्वास हो जायेगा कि वह गलती पर थे।

फिर शायद वह अपनी निकाली हुई पत्नी को अपने घर वापस बुला लें और अपने बहादुर और होशियार बच्चे को राजगद्दी दे दें।”

शबरंग बोला — “ठीक है। मैं इस काम के लिये अपनी पूरी भरसक कोशिश करूँगा।” और यह कह कर वह तुरन्त ही काश्मीर के लिये रवाना हो गया।

राजा के महल में जा कर उसने सबसे पहला काम यह किया कि उसने राजा के दरबान से दोस्ती की। उसकी यह दोस्ती इतनी बढ़ी कि वह दरबान शबरंग के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार था।

एक दिन दरबान ने शबरंग से पूछा कि क्या वह राजा के महल में नौकरी करना चाहेगा। क्योंकि वह चाहता कि वह राजा के महल में राजा की सेवा करे। शबरंग ने उसको धन्यवाद दिया और कहा कि हाँ हाँ क्यों नहीं वह भी राजा के महल में राजा का काम करना पसन्द करेगा।

इस तरह दरबान ने शबरंग को राजा से मिलवाया और किसी भी काम के लिये जो भी राजा पसन्द करे उसकी होशियारियों की उसकी तन्दुरुस्ती की उसकी अक्लमन्दी की राजा से बहुत तारीफ की और उसको कोई नौकरी देने के लिये प्रार्थना की।

राजा शबरंग की शक्ल सूरत ढंग चाल और बोल चाल से बहुत प्रभावित हुआ और तुरन्त ही उसको अपना शाही नौकर रख लिया। उस ओहदे पर शबरंग ने सबका मन मोह लिया और बहुत जल्दी ही सबका बहुत प्यारा हो गया।

कुछ समय बाद उसने सोचा कि वह अपनी चोरी की शिक्षा को यहाँ इस्तेमाल करके देखे। सो कभी कभी रोज और कभी कभी तीसरे चौथे दिन रात को वह चोरी करने निकलता। वह शहर में इधर उधर चोरी करने निकलता और जहाँ कहीं भी उसको चोरी करने का मौका मिलता वह चोरी करता और चोरी की गयी चीज़ को एक मैदान में एक गड्ढे में छिपा देता।

यह उसको रोजमर्रा के काम में कुछ दखल नहीं देता। हर सुबह वह अपने काम पर नियमित रूप से पहुँच जाता।

धीरे धीरे बहुत सारे लोगों का पैसा और कीमती चीज़ें चोरी होने लगीं और चोर का कोई पता नहीं चला तो सब लोगों ने मिल कर राजा से प्रार्थना की कि वह अपनी पूरी कोशिशों के साथ चोर का जल्दी से जल्दी पता लगाये और फिर उसको सजा दे।

राजा को यह सुन कर बहुत दुख हुआ कि उसके राज्य में इस तरह चोरियाँ हो रही थीं। उसने अपने कोतवाल53 को बुलाया और उसको उसकी लापरवाही को लिये बहुत डाँटा और तुरन्त ही चोर का पता लगाने के लिये कहा।

कोतवाल ने इस बात पर बहुत अफसोस प्रगट किया और राजा से वायदा किया कि वह जल्दी ही चोर का पता लगाने की कोशिश करेगा। उस रात उसने चोर को पकड़ने की खास कोशिश की। हर सड़क पर पुलिस के लोग तैनात कर दिये गये और उनको सख्त हिदायत दी गयी कि वह सब जगह अपनी नजर रखें। कोतवाल खुद भी सारी रात इधर उधर घूमता रहा।

शबरंग को इस इन्तजाम का बिल्कुल पता नहीं था। वह उस रात तीन चार जगह गया और जितना उसने सोचा था उतना सामान चोरी किया और ला कर मैदान में उसी गड्ढे में छिपा दिया। अगले दिन ये तीन चार लोग राजा के पास गये और शिकायत की कि पिछली रात उनके घर से फलाँ फलाँ चीज़ें चोरी हो गयी हैं।

यह सुन कर राजा बहुत गुस्सा हुआ। उसने कोतवाल को बुलवाया। कोतवाल ने जब राजा को इतने गुस्से में देखा तो वह तो डर के मारे काँप गया। वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा और उनसे न्याय और माफी माँगी।

वह बोला — “राजा साहब खुश हों। इस नौकर की बात भी सुन लें। पुलिस के सारे लोग कल रात सारे शहर में गश्त लगाते रहे और एक मिनट को भी नहीं सोये। हर चौराहा और हर सड़क पर पूरा पहरा था। फिर यह सब कैसे हुआ?”

यह सुन कर राजा भी आश्चर्य में पड़ गया और बोला — “ऐसा लगता है कि या तो जनता को तुमसे शिकायत है और या फिर तुम लोगों में से ही कोई चोर है या फिर कुछ नौकरों ने मिल कर कुछ घरों में चोरी करने की साज़िश की है। मामला कुछ भी हो पर तुम इस सबकी छानबीन करो। चोर या चोरों का पता करो और उनको मेरे सामने लाओ। मैं तुमको इसके लिये एक हफ्ते का समय देता हूँ।”

इन सात दिनों में कोतवाल और उसके सब सिपाही इस काम में लगे रहे कि वह चोर के बारे में कोई सुराग पा सकें। कोतवाल बेचारे ने खुद भी अपना वेश बदल बदल कर चारों तरफ गश्त लगायी अपने बहुत सारे लोगों को भी वेश बदल कर चोर ढूँढने पर लगाया।

चोर ढूँढने वाले को इनाम देने का भी वायदा किया अगर उसने अपनी चोरी स्वीकार कर ली तो चोर को शाही माफी भी दिलवाने का भी वायदा किया। उसने चारों तरफ मुनादी भी पिटवायी पर सब बेकार। चोर का कुछ पता न चला। चोर पकड़ा न जा सका। हालाँकि वह इस सारे समय चोरी करता रहा।

इतने सारे उपाय काम में लाने की वजह से शबरंग की चोरी करने की इच्छा और बढ़ती गयी और वह और भी बड़ी बड़ी चीज़ें चुराने लगा।

शहर में खलबली मच गयी। राजा से ले कर सबसे नीचे आदमी तक को यह डर रहा कि पता नहीं कब उसके यहाँ चोरी हो जाये। दिन रात सब लोग अपनी देखभाल रखते पर फिर भी हर एक को यह डर था कि उसके यहाँ कभी भी चोरी हो सकती है।

सातवें दिन की शाम को कोतवाल ने राजा से कहा — “अब क्या किया जाये। जो कुछ हम लोग कर चुके हैं इससे ज़्यादा तो कोई और कुछ कर भी नहीं सकता।”

राजा बोला — “यह तो तुम ठीक कहते हो। पर तुम अबकी बार हमारी सेना ले लो और उसको जैसे तुम चाहो इस्तेमाल करो पर चोर को पकड़ो।”

सो सातवीं रात को सिपाही और पुलिस सभी पास पास खड़े हो कर चोर को ढूँढने में लग गये। कोतवाल भी सारी रात पहरा देता घूमता रहा।

इस इन्तजाम के बीच में उसने एक आदमी को नदी के किनारे वाले बागीचे में जल्दी जल्दी जाते देखा तो वह चिल्लाया “चोर चोर” और उसके पीछे दौड़ा। उसे पकड़ने पर उस आदमी ने कहा — “नहीं नहीं मैं चोर नहीं हूँ। मैं तो गरीब माली की पत्नी हूँ और यहाँ पानी भरने आयी हूँ।”

कोतवाल बोला — “तुम यहाँ इस समय पानी भरने आयी हो? तुमने शाम तक पानी क्यों नहीं भरा?”

उस आदमी ने कहा — “मुझे घर में बहुत काम थे।”

कोतवाल ने पूछा — “क्या तुमने चोर के बारे में कुछ सुना है या तुम उसके बारे में कुछ जानती हो?”

वह आदमी बाला — “हाँ हाँ मैं जानती हूँ पर बताने से डरती हूँ। कहीं ऐसा न हो कि वह मुझे मारे। वह अभी अभी यहीं था और वह मेरी बहुत सारी सब्जियाँ ले गया है। अगर तुम थोड़ा सा इन्तजार करो तो तुम उसे पकड़ सकते हो क्योंकि वह यहाँ फिर से आने वाला है। वह इस तरफ से आया था और उस तरफ चला गया है।”

कोतवाल यह सुन कर बहुत खुश हुआ — “यह तो बड़ी अच्छी खबर है। पर मैं उसको पकड़ कैसे सकता हूँ। यहाँ तो कोई झाड़ी भी नहीं है जिसमें मैं जा कर छिप जाऊँ और अगर उसने मुझे देख लिया तो वह भाग जायेगा।”

माली की पत्नी बोली — “लो तुम मेरा यह पुराना पिरहन ओढ़ लो और ऐसा दिखाओ जैसे तुम यहाँ पानी भरने आये हो। मुझे पूरा विश्वास है कि वह यहाँ जरूर आयेगा और मेरी बाकी बची हुई सब्जियाँ भी ले जायेगा। जब वह यहाँ आयेगा तब तुम उसको पकड़ सकते हो।”

कोतवाल को यह विचार बिल्कुल पसन्द नहीं आया फिर भी उसने उसका वह पुराना पिरहन ले लिया और पहन लिया। फिर उससे पूछा कि वह उसको पानी भरना सिखाये कि पानी कैसे भरते हैं। माली की पत्नी ने उसे डंडे के भारी वाले सिरे की तरफ बाँध दिया जिससे पानी खींचा जाता था और फिर उससे दूसरे सिरे पर बँधी रस्सी को खींचने के लिये कहा। उसने ऐसा ही किया जिससे वह करीब करीब बीस फीट जमीन से ऊपर उठ गया। इसके बाद माली की पत्नी ने उसके डंडे के दूसरे सिरे को जमीन में गड़े एक छोटे से डंडे से बाँध दिया उसके कपड़े उठाये और उसे वहीं उसी हालत में छोड़ कर चली गयी।

कोतवाल चिल्लाया “ओह ओह” तो माली की पत्नी बोली — “श श श। चुप रहो अगर चोर सुन लेगा तो फिर वह इस तरफ नहीं आयेगा। तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। यह डंडा अपने आप ही नीचे नहीं गिरेगा। जब चोर आयेगा तब मैं तुमको नीचे ले आऊँगी तब तुम चोर को पकड़ लेना।”

अब तो तुम्हारी समझ में आ गया होगा कि यह माली की पत्नी कौन थी। यह माली की पत्नी नहीं बल्कि शरभंग खुद था। कोतवाल को बाँधने के आधे घंटे बाद वह अपने बिस्तर में सो रहा था।

आधे घंटे के बाद भी जब चोर के वहाँ दोबारा आने की कोई आशा नहीं दिखायी दी तो कोतवाल ने चिल्ला कर अपने आपको उतारने के लिये कहा तो उसे कोई जवाब नहीं मिला।

उसने सोचा कि शायद माली की पत्नी की आँख लग गयी होगी तो वह फिर चिल्लाया — “मुझे नीचे उतारो। लगता है कि चोर अब यहाँ दोबारा नहीं आयेगा। मुझे नीचे उतारो यहाँ तो हवा बहुत ठंडी है। मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ क्योंकि लगता है कि चोर कहीं और चोरी कर रहा है।”

इसका भी कोई जवाब नहीं आया तो वह फिर दुखी हो कर चिल्लाया — “उफ़ यह कौन सी चाल है। लगता है यह माली की पत्नी नहीं थी बल्कि चोर खुद था और वही मुझे यहाँ बाँध कर चला गया है।”

अगले दिन कुछ लोगों ने राजा से जा कर फिर शिकायत की कि पिछली रात उनका कुछ सामान चोरी हो गया। राजा ने यह जानने के लिये कि उसने कल रात क्या किया अपने कोतवाल को बुला भेजा पर कोतवाल तो घर पर ही नहीं था। बल्कि यों कहो तो वह तो कल शाम से ही अपने घर पर नहीं था। सो राजा का नौकर उसको शहर भर में ढूँढता फिरा।

आखिरकार वह उसी बागीचे में आ पहुँचा जिसमें वह बदनसीब कोतवाल रात चोर पकड़ने के लिये घुसा था। वहाँ उसको वह एक स्त्री का पिरहन पहने कुँए से पानी निकालने वाले एक डंडे पर बैठा हुआ था और बेचारा ठंड से जमा जा रहा था।

ऐसा न हो कि राजा को उसकी बात पर विश्वास न हो उसने राजा से खुद वहाँ आने और उसको वहाँ उस हालत में बैठा देखने की प्रार्थना की। सो राजा खुद वहाँ आया और उसको इस हालत में बैठा देख कर हँसी से दोहरा हो गया।

उसको वहाँ से उतारा तो जब उसके पैर जमीन पर लगे उसने राजा को समझाया कि यह सब कैसे हुआ था। फिर उसने उससे कहा कि वह इस बात के लिये उसकी जान भी ले सकता था क्योंकि अब उसको जीने की परवाह नहीं थी।

राजा ने अपने वजीर से पूछा कि अब क्या किया जाये। अगर इस चोर को न रोका गया तो हमारे राज्य पर तो भारी मुसीबत आ जायेगी। इसको कैसे पकड़ा जाये ताकि लोगों का सामान और ज़्यादा चोरी न हो सके। क्योंकि अगर ऐसा ही रहा तो लोग देश छोड़ छोड़ कर भागने लगेंगे।

वजीर बोला — “नहीं नहीं राजा साहब ऐसा नहीं हो सकता और न होगा। अगर राजा साहब मुझे इजाज़त दें तो मैं इस रात उस चोर को पकड़ने की कोशिश करूँ जिसने हम सबकी शान्ति लूट रखी है।”

राजा ने उसको इजाज़त दे दी। जैसे ही शाम हुई वजीर अपने घोड़े पर चढ़ कर शहर की गश्त के लिये निकल पड़ा। शबरंग चोर भी अपना काम करने निकल पड़ा। उसने एक गरीब मुसलमान का वेश रखा पुराना फटा सा पिरहन पहना सिर पर चिकनी सी लाल कसाब पहिनी उसके ऊपर मैली सी पूत्स डाली और चल दिया। जा कर वह एक मिट्टी की झोंपड़ी के दरवाजे पर बैठ गया। उसने झोंपड़ी की पीछे की दीवार मे लगे दिये को जलाया और उसकी मद्धम रोशनी में मक्का पीसने बैठ गया।

घूमते घूमते वजीर उधर से निकला तो उसको पीसने की आवाज आयी तो यह देखने के लिये इतनी रात गये यह कौन पीस रहा है वह अपना घोड़ा उस झोंपड़ी की तरफ ले आया और पूछा — “यहाँ कौन है?”

जवाब मिला “एक बुढ़िया। मैं यहाँ मक्का पीस रही हूँ।” और फिर जैसे कि वह पहिली बार देख रही हो कि वह घुड़सवार वजीर था बुढ़िया बड़ी दया भरी आवाज में बोली — “काश तुम चोर को पकड़ सकते। अभी अभी एक आदमी यहाँ आया था। उसने मुझे बहुत मारा और मेरा सारा मक्का का आटा ले गया जो मैंने अपने खाने के लिये पीसा था।”

“चोर। क्या? कहाँ है वह मुझे बताओ कहाँ है वह? किधर गया है वह?”

पहाड़ी के नीचे की तरफ इशारा करते हुए वह बोला “उस तरफ।”

वजीर ने अपना घोड़ा उसी तरफ दौड़ा दिया पर वहाँ तो चोर का कोई नामो निशान नहीं था। सो वह वापस आया और उस मुसलमान स्त्री से फिर से उस चोर के बारे में पूछा।

शरभंग बोला — “मैंने तुम्हें सब कुछ तो बता दिया। अब और क्या। लेकिन इसका फायदा भी क्या है। जिस तरह के तुमने कपड़े पहिने हैं और जैसे शानदार घोड़े पर तुम बैठे हो इस तरह से तुम चोर को कभी नहीं पकड़ सकते।

क्या तुम एक बुढ़िया की सलाह मानोगे? तुम मेरे कपड़े पहिन लो और मेरी जगह बैठ जाओ। तुम यहाँ ठहरो और मैं चोर की खोज में जाती हूँ। जब तुम यहाँ हो तो तुम मेरी मक्का पीस सकते हो। वह यहाँ दोबारा भी आ सकता है तब तुम उसको पकड़ लेना।”

वजीर को यह तरकीब अच्छी लगी सो उसने उसे मान लिया। उधर शबरंग ने वजीर के कीमती कपड़े पहने उसके शानदार घोड़े पर चढ़ा और शहर के बाजार से हो कर चल दिया। एक दो घंटे बाद वह महल के आँगन में राजा के दूसरे नौकरों के साथ बात करता पाया गया।

अगले दिन फिर से लोग रोते चिल्लाते राजा के पास आये और अपने घर में चोरी की शिकायत की। कुछ ने कहा कि उनका पैसा चोरी हो गया कुछ ने कहा कि उनके जवाहरात चोरी हो गये और कुछ ने कहा कि उनका अनाज चोरी हो गया।

“उफ़ उफ़ मैं क्या करूँ। यह तो बड़े अफसोस की बात है। वजीर को बुलाओ।” राजा झल्ला कर बोला।

तुरन्त ही एक नौकर वजीर को बुलाने उसके घर भेजा गया। उसके घर जा कर उसको पता चला कि वजीर का घोड़ा तो बिना वजीर के घर आ गया था। और इसकी वजह से वजीर का सारा परिवार पागल सा हो रहा था। उनको लग रहा था कि वजीर ने चोर को पकड़ तो लिया था पर चोर ने उसे मार दिया।

जब राजा ने यह सुना तो वह तो बहुत ही दुखी हुआ। उसने तुरन्त ही अपना घोड़ा तैयार करने का हुकुम दिया अपने कुछ नौकरों को बुलाया जिनमें शबरंग भी शामिल था और वजीर को ढूँढने के लिये चल पड़ा।

वह बोला — “यह नहीं हो सकता कि इतना अक्लमन्द और वफादार आदमी इस तरह से मर जाये।”

एकाध घंटे में वे सब उसी मिट्टी की झोंपड़ी के पास से गुजरे जहाँ रात को वह मुसलमान बुढ़िया मक्का पीस रही थी। वहाँ उनको बेचारा वजीर उस मुसलमान बुढ़िया के मैले और फटे कपड़े पहने बहुत ही दयनीय दशा में रोता हुआ मिल गया।

वह बोला — “राजा साहब आप यहाँ से चले जाइये मेरी इस शर्मनाक हालत को मत देखिये। अब इस देश में मैं अपना सिर कभी नहीं उठा सकता।”

राजा उसको धीरज बँधाते हुए बोला — “ऐसा नहीं है। हिम्मत रखो। हमें अभी उस आदमी को ढूँढना है जिसने देश भर में खलबली मचायी हुई है और हमारे वजीर को इस तरह से बेइज़्ज़त किया है।” राजा ने फिर वजीर को उसके घर छुड़वा दिया।

अगली रात थानेदार ने कहा कि वह चोर को ढूँढने का जिम्मा लेता है। हालाँकि वह नीचे ओहदे का था पर फिर भी राजा ने उसका कहा मान लिया।

उस रात शबरंग ने वजीर की बेटी का वेश रखा और इस आशा में कि थानेदार रात के शुरू के समय में वहाँ आयेगा वजीर के बागीचे में उसका इन्तजार करने लगा।

उसका सोचना गलत नहीं था। सोने के समय से बस ज़रा सा ही पहले थानेदार वहाँ आया और बागीचे में किसी को घूमते हुए देख कर उससे पूछा “कौन हो तुम?”

जवाब मिला — “मैं वजीर की बेटी हूँ। तुम्हें क्या चाहिये।”

थानेदार बोला — “मैं चोर को ढूँढने निकला हूँ। कल उसने तुम्हारे पिता की बेइज़्ज़ती की थी और उससे पहिले कोतवाल की बेइज़्ज़ती की थी आज मैं अपनी किस्मत आजमाने निकला हूँ।” शबरंग बोला — “पर अगर तुम्हें वह मिल जाये तो तुम उसका क्या करोगे?”

थानेदार बोला — “मैं उसको जंजीरों से बाँध कर जेल में डाल दूँगा और रोज उसको इतना पीटूँगा जितना वह सह सकेगा।”

लड़की बोली — “ओह थानेदार साहब मैं वह जेल देखना चाहती हूँ। मेरी अक्सर यह इच्छा रही है कि मैं उसे देखूँ पर मेरे पिता ने मुझे उसे कभी देखने ही नहीं दिया। आज मुझे उसे देखने का मौका मिला है। वह दूर तो नहीं है। मुझे उसे दिखा दो न।”

थानेदार बोला — “उसे देखने के लिये तुम्हें किसी और समय का इन्तजार करना पड़ेगा इस समय तो मुझे चोर को पकड़ना है। इसके अलावा अगर तुम्हारे पिता को यह पता चला कि तुम इतनी रात गये यहाँ बागीचे में टहल रही हो तो तुम्हारे पिता भी नाराज होंगे। इसलिये घर जाओ और जा कर सो जाओ।”

लड़की बोली — “पिता जी को कभी मालूम नहीं चल पायेगा कि मैं यहाँ हूँ और जेल देखने गयी थी। वह बीमार हैं। कल उनको बीमारी की हालत में ही घर लाया गया था। जल्दी करो मैं आ रही हूँ।”

इस तरह पकड़े जाने पर थानेदार उसको जेल ले कर चला। जेल में केवल एक ही चौकीदार था क्योंकि बाकी सारे लोग चोर को ढूँढने पर लगाये गये थे। लड़की के कहने पर थानेदार ने उसे जेल का सब कुछ दिखा दिया।

यह दिखाने के लिये कि किसी चोर को जब जेल में डाला जाता है तो कैसे डाला जाता है उसने अपने आपको जंजीरों में भी जकड़ा और जेल के कमरे में गया। जैसे ही वह जेल के कमरे में गया शबरंग ने उसको एक धक्का दिया जिससे थानेदार उसमें लुढ़क गया।

फिर उसने लड़की के कपड़े उतार कर थानेदार की पगड़ी पहिनी उसकी पेटी अपनी कमर में बाँधी और सीधा थानेदार के घर जा पहुँचा।

थानेदार की पत्नी से वह जल्दी जल्दी बोला — “मुझे कुछ पैसे और जवाहरात दो मुझे यह शहर छोड़ कर किसी दूसरे शहर में बसना होगा। मैं चोर का पता नहीं लगा पाया सो राजा अब मुझे नौकरी से निकाल देगा। जल्दी करो जल्दी से मुझे ये दे दो ताकि मैं जल्दी से यहाँ से जा सकूँ। जहाँ कहीं भी मैं रहूँगा वहाँ से मैं तुम्हें बाद में खबर करूँगा कि तुम्हें मेरे पास कब और कैसे आना है।”

थानेदार की पत्नी यह सुनते ही घबरा गयी उसने तुरन्त ही सैंकड़ों रुपये और कुछ जवाहरात उसको ला कर दे दिये। शबरंग ने उसको चूमा और वहाँ से भाग लिया।

अगली सुबह राजा ने थानेदार को बुलवाया पर वह तो घर पर था ही नहीं तो उसको सारे शहर में ढूँढा गया। राजा के आश्चर्य की सीमा न रही जब उसको वह उसी की जेल में बन्द जंजीरों से जकड़ा मिला। और यह भी कि चोर थानेदार के घर गया था और वहाँ से सैंकड़ों रुपये और जवाहरात ले कर चला गया है।

उसने अपने बहुत सारे अक्लमन्द लोगों की एक सभा बुलायी और उनसे सलाह माँगी कि इस मौजूदा हालत में क्या किया जाये।

वह बोला — “आप लोगों ने देखा कि चोर को पकड़ना बेकार है। हम लोग हवा को पकड़ सकते हैं पर उसे नहीं। हमारी सारी पुलिस और बहुत सारी फौज कई दिनों से इस काम में लगी हुई है पर सब उसको पकड़ने में नाकामयाब रहे। इतना पहरा बिठाये जाने के बावजूद चोरियाँ होती रहीं।

हमारे वजीर कोतवाल और थानेदार की हँसी उड़ायी गयी। अब हम क्या करें। अगर कोई हमारी सहायता कर सकता है तो आगे आये या फिर चोर अपनी गलती खुद ही स्वीकार कर ले और यह वायदा करे कि वह आगे से ऐसे बुरे काम नहीं करेगा तो हम उसके साथ अपनी बेटी की शादी कर देंगे और उसको अपना आधा राज्य दे देंगे।”

राजा के ऐसा कहने पर शबरंग आगे आया और राजा से कुछ बोलने की इजाज़त माँगी। इजाज़त मिलने पर वह बोला — “ राजा साहब आपने अपने राज्य के सब अक्लमन्दों के सामने यह कहा है कि अगर चोर आपके सामने आ कर अपनी चोरियाँ स्वीकार कर ले और आगे कोई चोरी न करने का वायदा करे तो आप उसे अपना आधा राज्य और बेटी दे देंगे।”

राजा बोला — “हाँ।”

शबरंग फिर बोला — “तो मैं हूँ वह चोर। अपने आपको चोर साबित करने के लिये राजा साहब अपने उन सब लोगों को हुकुम दें जिन्होंने अपनी अपनी चीज़ें खोयी हैं कि कल वे मेरे साथ फलाँ फलाँ जगह चलें तो मैं उनको उनकी सारी चीज़ें लौटा दूँगा।”

सारी सभा को यह सुन कर बहुत आश्चर्य हुआ। लोग शबरंग की तरफ इस तरह देखने लगे जैसे वह कोई देवता हो। कुछ लोगों को लगा कि वह पागल हो गया है और उनके मुँह से कोई बोल ही नहीं फूटा। कुछ समय तक तो राजा भी कुछ नहीं बोल सका।

बाद में वह बोला — “ठीक है ऐसा ही होगा। शबरंग तुम मुझसे अकेले में मिलो।” राजा शबरंग के साथ उठ कर चला गया और सभा भी खत्म हो गयी।

अकेले में जा कर राजा ने शबरंग से कहा कि वह अपना वायदा निभायेगा। वह उसको आधा राज्य भी देगा और अपनी बेटी भी। इसका इन्तजाम बहुत जल्दी ही किया जायेगा।

अगले दिन जिन जिनके घर में चोरियाँ हुई थीं वह सब इकट्ठा हुए और शबरंग के बतायी हुई जगह से राजा और वजीर के सामने अपनी चीज़ें पैसे जवाहरात कपड़े आदि सब वापस ले लिये। यह जगह शहर की चहारदीवारी के पास वाले मैदान में थी। सब लोग खुशी खुशी अपने घर चले गये।

महल लौटने के बाद शबरंग ने राजा से अपनी माँ को वहाँ बुलाने की इजाज़त माँगी ताकि इस शादी के बारे वह अपनी माँ से सलाह कर सके। राजा राजी हो गया और उसकी माँ को बुला लिया गया।

राजकुमारी तुरन्त ही आ गयी और राजा से मिलने की इजाज़त माँगी। राजा ने उसका बड़ी शान से स्वागत किया और इस बात की खुशी प्रगट की कि वह अपनी बेटी को इतने अक्लमन्द और सुन्दर लड़के को दे रहा है।

राजकुमारी ने कहा — “यह सब राजा साहब की कॄपा है पर यह शादी नहीं हो सकती। यह ठीक नहीं कि भाई बहिन की शादी हो।”

राजा बोला — “मैं समझा नहीं।”

राजकुमारी बोली — “इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पर यह अँगूठी और रूमाल आपको मेरी याद जरूर दिलायेगा। आप इन्हें ले लीजिये ये आप ही के हैं और मुझे वह अँगूठी वापस कर दीजिये जो मैंने आपको दी थी। अब तो आपको मेरी याद आ गयी होगी।”

तब उसने राजा को सारी बातें बतायीं कि किस प्रकार वह उसकी कानूनन पत्नी थी। और क्योंकि उसने उसको छोड़ दिया था इसलिये वह उससे वेश बदल कर मिली थी। फिर कैसे शबरंग पैदा हुआ कैसे उसने उसको बड़ा किया फिर कैसे उसने उसको काश्मीर भेजा।

अब क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो गया था जो उसने राजा से अपने पिता के बागीचे में पहली बार मिलने पर कहा था कि वह उस जैसे राजा से एक बेटा पैदा करेगी और फिर वह उसकी बेटी से शादी करायेगी।

तब काश्मीर के राजा ने राजकुमारी से सुलह कर ली और उसको अपनी पत्नी का दरजा दे दिया। राजकुमार को युवराज घोषित कर दिया गया और तीनों आराम से बहुत दिनों तक खुशी खुशी रहे।

(सुषमा गुप्ता)

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