Sunday, February 25, 2024
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सपना लानेवाला राजकुमार : कर्नाटक की लोक-कथा

Sapna Laanewala Rajkumar : Lok-Katha (Karnataka)

मैसूर नामक एक शहर था, वहाँ पर एक राजा था। उस राजा के तीन बेटे थे। एक का नाम था ललित कुमार और दूसरे का नाम बसव कुमार था। छोटेवाले का नाम था कृष्ण कुमार। वे तीनों विद्या-बुद्धि आदि में बहुत तेज थे।

एक दिन की बात है कि राजा ने एक सपना देखा। सपना बहुत अजीब सा था। अपने परदानी (मंत्री) को बुलाकर अपनी पत्नी को साथ बिठाता है और सपने की बात कहता है कि सपने में एक सोने का चबूतरा, चाँदी का पीपल वृक्ष, उस पर रत्न खानेवाला पक्षी नाच रहा था। वह सपना देख मन बहुत खुश हुआ, मगर उससे यह शक भी हुआ कि अपने को या पक्षी को, किसी का भी कुछ बुरा घटनेवाला है।

वह परदानी से पूछता है कि उस पक्षी को लानेवाला कोई पुण्यात्मा हो सकता है क्या?

तब परदानी हजार रुपए का पन लगाकर शहर में ढिंढोरा पिटवाता है, मगर इस काम का कोई नहीं मिलता। जिस किसी ने यह बात सुनी, उन सबने यही कहा कि इस तरह के सपनेवाली बात सच हो ही नहीं सकती। इसे कोई भी नहीं ला सकता।

राजा के बेटे थे तीन, वे अबोध थे। उन तीनों ने राजा से कहा, ‘पिताजी आप चिंता न करें, हम वह पक्षी-पेड़ सब आपको ला देंगे।’ उन तीनों ने जब हठ पकड़ा तो परदानी ने उहें यह कहकर समझाने की कोशिश की कि अपने पिता के सपने में दिखी चीजें तुम लोग ला दोगे तो यह हो सकता है कि लोगों को आप पर शक हो जाए। इसके लिए अवसर नहीं देना चाहिए। जवाब में ललित कुमार ने कहा, “हमारे पराक्रम का पता चारों तरफ के गाँवों को चलना चाहिए, इसलिए हम लोग जरूर पिताजी के सपने को साकार करके रहेंगे।”

ललित कुमार, बसव कुमार की प्रतिज्ञा की बात राजा तक पहुँचती है। सुनकर राजा को खूब च‌िंता होती है। वे सोचने लगते हैं कि जो काम संसार में कोई नहीं कर सकता, वह ये बच्चे कहाँ से कर पाएँगे?

ललित कुमार और बसव कुमार ने परदानी से यह पता लगाने के लिए कहा कि राजा उन्हें भेजेंगे कि नहीं?

परदानी राजा से पूछता है। तब राजा बच्चों को निराश न करने के उद्देश्य से उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति देता है।

अगले दिन लड़के निकलने को तैयार होते हैं तो उनकी माँ खाना बनाकर उन्हें खिलाती है और रास्ते के लिए पाथेय भी बाँधकर दे देती है।

लड़के अपनी यात्रा के लिए घुड़साल से अच्छे से घोड़े चुनकर यात्रा पर निकलने को तैयार होते हैं।

फिर दोनों लड़के शहर में जलसा कर अपने काम पर निकलते हैं। तब तक कृष्ण कुमार घर आकर माँ से अपने भाइयों के बारे में जानकारी लेता है। माँ से जानकारी पाकर वह भी अपने भाइयों के साथ निकलने का हठ करता है तो उसे भी माँ खाना खिलाकर उसके भाइयों के साथ जाने देती है।

कृष्ण कुमार पाथेय को लेकर फिर भाइयों के पास पहुँचने के लिए भाग आता है। तब तक भाई लोग काफी दूर निकल गए होते हैं। वह उनसे मिलने के लिए भागता तो है, मगर जल्दी थक जाता है। फिर भी भाई लोग नहीं मिलते।

अब घर भी दूर, भाई भी नहीं मिले, वह बहुत दुःखी होता है। वह और थोड़ी दूर आगे बढ़ता है। वहाँ उसे एक बड़ी नदी दिखती है। वहाँ पर उसके दोनों भाई बैठे होते हैं। उन्हें देख उसकी सारी थकान दूर होती है। वह खुशी से उछलकर ‘भैया’, कहकर जोर से पुकारता है।

विधि का खेल। उसकी खुशी का दूसरा परिणाम निकला।

दोनों भाई उसे देख गुस्से में आते हैं और डाँटकर कहते हैं, “मूर्ख, तू क्यों आया? वहाँ माँ-बाप के पास कोई नहीं, वापस जा।” कहकर उसे चाँटा मारते हैं।

वह थोड़ी दूर लौटकर वापस आ जाता है। भाइयों को आवाज देता है।

नदी में उस समय नहा रहे भाई बाहर आते हैं और गुस्से से उसे नदी में धकेल देते हैं। फिर खाना खाने बैठते हैं, मगर देखते क्या है कि सारा पाथेय बासी होकर उसमें से पानी निकल रहा है। तब छोटे भाई का पाथेय खोलते हैं। वह बहुत ताजा होता है, जिसे खाकर वे लोग अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते हैं।

यहाँ नदी में पड़े कृष्ण कुमार को एक बड़ी मछली निगल लेती है। निगलने पर उसे बहुत कष्ट होता है। मछली दर्द में तड़पते हुए शिव-पार्वती का ध्यान कर एक चट्टान पर बैठकर रोती रहती है। तभी शिव-पार्वती अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ उसी मार्ग से गुजरते हैं। उन्हें मछली का रोना सुनाई देता है। वे मछली से पूछते हैं। मछली के पेट का दर्द जानकर वे एक भस्म बनाकर देते हैं। उस भस्म का सेवन करते ही कृष्ण कमार मछली के मुँह से बाहर आता है।

शिव-पार्वती कैलास लौट जाते हैं। मछली कृष्ण कुमार से कहती है कि तुम मेरे पेट से जनमे हो, इसलिए तुम मेरे बेटे हो।

कृष्ण कुमार अबोध बालक था। उसने सारी कहानी मछली को सुना दी तो मछली उसे अपनी पीठ पर बिठाकर नदी के दूसरे किनारे पर पहुँचा देती है।

उधर ललित कुमार और बसव कुमार तरीकेरे नामक शहर तक आ पहुँचते हैं। वहाँ पर एक वेश्या का घर होता है, वह अपने मकान के आगे एक पट्टिका लगाए रहती है, जिसमें यह लिखा रहता है कि मेरे यहाँ आनेवाले राजा को मुझे एक रात के लिए एक हजार रुपए का शुल्क लगेगा और मेरे दिए पानी में इस तरह नहाना होगा कि बाल गीले न हों, उसके बाद झूले पर आकर बैठकर पासा खेलते बैठना होगा, इस तरह खेलते समय एक बिल्ली की मदद से वह वेश्या जीत जाती है।

इस तरह तीसरा खेल खेलते समय कृष्ण कुमार बिल्ली का आना ध्यान से देखता है और उसे अपने पाँवों से लात मारता है। तब उसी की (कृष्ण कुमार की) जीत होती है। वेश्या अब कृष्ण कुमार से शादी करना चाहती है, मगर कृष्णकुमार उससे यह कहकर कि मैं यहाँ एक महत्त्वपूर्ण कार्य से आया हूँ, वह काम खत्म कर फिर मैं तुमसे तीन महीने बाद शादी करूँगा, आगे बढ़ जाता है।

वह आगे बढ़ता है, आगे बढ़ता ही रहता है। वहाँ पर एक जंगल मिलता है। वहाँ पर एक ऋषि तपस्या करते बैठे रहते हैं। कृष्ण कुमार वहाँ जाता है। वहाँ एक वेताल आकाश और भूमि में एकाकार होकर कृष्ण कुमार को उठा लेता है, आगे बढ़ता है। तब कृष्ण कुमार को याद आता है कि मछली ने उसे एक वादा लिया था। वह मछली का स्मरण करता है। स्मरण करते ही वेताल के लिए कृष्ण कुमार भारी बहुत भारी हो जाता है। वह उसे उठा नहीं पाता। इसलिए कृष्ण कुमार को नीचे उतारकर वह अदृश्य हो जाता है।

कृष्ण कुमार वहीं उतरता है, जहाँ ऋषि तपस्या में निमग्न हैं। तब सुबह होती है। ऋषि तब आँख खोलकर देखते हैं। उसे लगता है कि कृष्ण परमात्मा ही उसे दर्शन देने वहाँ आ पहुँचे हैं। वे उससे पूछते हैं कि तुम कौन हो?

कृष्ण कुमार कहता है कि उसे कुछ पता नहीं कि वह कौन है, कहाँ से आया है। ऋषि कहते हैं कि तुम्हारी वजह से मेरा तपोभंग हुआ, मगर कुछ बात नहीं। तुम अपना सही परिचय दो। तब ऋषि पर विश्वास कर कृष्ण कुमार अपनी सारी कहानी कहकर उससे विनती करता है कि जिस उद्देश्य से वह आया है, वह काम पूरा करवा दें।

जवाब में वह ऋषि उसे यह कहकर अगले ऋषि के पास भेजता है कि उससे यह काम नहीं हो सकता, मगर अगले ऋषि से यह काम हो सकता है। याद रखना कि उससे तुम नहीं बोल सकते, वह साधारण से ऋषि नहीं। उसकी रक्षा के लिए साँप, राक्षस, बाघ, भालू बैठे रहते हैं। उनसे बचकर ऋषि के पास नहीं जा सकते। उनसे बचने के लिए मैं तुम्हें तीन रत्नमंत्र पोषित करके दूँगा। उसे ले जाकर मेरे सुझाव अनुसार तुम्हें उपयोग करना होगा।

जंगल में आगे बढ़ने पर साँप आता है, तब एक रत्न डालना। वहाँ आगे बढ़ने पर राक्षसगण आते हैं। तब एक रत्न डालना, फिर बाघ-भालू आते हैं, तब तीसरा रत्न डालना। इस तरह सबके अदृश्य होने पर दो पत्थर रखकर मेरे द्वारा दिए गए अक्षय पात्र में चावल डालकर पानी डालकर पकाते रहना। इतना कह ऋषि उसे भेजता है। वह आगे जाकर वही सब करता है, जैसे ऋषि ने समझाया था। साँप, राक्षस बाघ, भालू सभी अदृश्य होते हैं, तब ऋषि के सामने आता है, फिर अक्षय पात्र में चावल पकाना शुरू करता है। एक बार अक्षय पात्र उलटकर अक्षय कुमार के ऊपर गिरता है। वह उसे सीधा करता है, मगर वह फिर बार-बार उलटता है। वह सीधा करता ही रहता है। तभी ऋषि जागकर आँख खोलता है। सामने उसे कृष्ण कुमार दिखता है।

उसने देखा कि दो गोल पत्थर रखकर वह बरतन को उस पर टिकाने की कैसी मूर्ख कोशिश कर रहा है। वह कहता है, “बेटे तीन पथर रख चूल्हा बनाओ, तब बरतन में चावल डालो।”

कृष्ण कुमार कहता है, “स्वामीजी, मैं आपके आदेश का पालन कर सकता हूँ, मगर मुझे भूख नहीं लगी है। मैं एक सपने को साकार बनाने का उद्देश्य लेकर यहाँ आया हूँ, मुझमें इतनी ताकत नहीं है। मैं आपकी मदद माँगने यहाँ आया हूँ।” ऋषि उसकी बात पूरी तरह सुनकर कहते हैं, “बेटा, मैं यह काम नहीं कर सकता, पर मेरे निर्देश का पालन करो। मैं तुम्हें तीन रत्नों से मंत्रित कर दूँगा। उन्हें लेकर तुम आगे बढ़ो तो एक कचनार का पेड़ तुम्हें दिखाई देगा। उस पेड़ की बगल में काँच का कुआँ है। उसकी बगल में एक बड़ा सा बरगद का पेड़ है। वहाँ एक राक्षस है। मेरा नाम लेकर उसमें एक रत्न डालो तो राक्षस के कष्टक से (कष्ट से) तुम पार हो जाओगे। तब उस कुएँ में उतरने पर तुम्हें नाग कन्याएँ मिलेंगी। वे अगर तुम्हें एकटक देखेंगी तो तुम मर जाओगे। इसीलिए मैं तुम्हें याद दिला रहा हूँ कि तुम उसके अंदर एक रत्न डाल देना। तब सब ठीक हो जाएगा और अपना काम निपटाकर आ जाओगे, यह कहकर ऋषि उसे आशीर्वाद देता है।

तब कृष्ण कुमार आगे बढ़ता है। बढ़ता ही जाता है। फिर ऋषि के निर्देशानुसार कचनार का पेड़, काँच का कुआँ, फिर रत्न उड़ेलता है। राक्षस के मुँह में रत्न डालकर कुएँ में उतरता है। फिर उधर से एक इनसान की आवाज आती है। फिर नाग कन्याएँ, वे कपड़े उतारती रहती हैं। वे एक इनसान की गंध की बात कहती हैं। फिर तीसरा रत्न भी वह वहाँ डालता है। नाग कन्याएँ कृष्ण कुमार को खूब प्यार देती हैं। फिर उसके साथ वे पासे खेलती हैं। कृष्ण कुमार उनसे यह वचन लेकर कि खुद के जीतने पर कन्याएँ उसकी इच्छा की पूर्ति करेंगी या उल्टा खुद के हार जाने पर वह उनकी इच्छा का पालन करेगा, खेलता है।

कृष्ण कुमार एक दिन उनसे जोर देकर कहता है कि मुझे कोई काम चाहिए। तब कन्याएँ उसे कहती हैं कि हम उसे तीन रत्न देंगी। हमारी बात मानकर रत्नों का उपयोग करने पर वे तुम्हारे सपने को साकार बनाकर देंगी।

वे कहती हैं, “पहले तुम हमें काटकर फेंक दो।” वह उनके आदेश का पालन करता है। नाग कन्याओं को मुक्ति मिलती है। राजा का सपना साकार होता है।

इधर ललित कुमार और बसव कुमार भी नाग कन्याओं को ढूँढ़ते हुए उसी जगह आ पहुँचते हैं। तभी नाग कन्याएँ एक माया महल रचती हैं। वहाँ पर तीनों भाइयों की भेंट होती है। तीनों मिलकर मैसूर शहर लौटते हैं।

राजा को उसके सपने का सच्चा स्वरूप दिखाते हैं। सभी मिलकर खुश होते हैं।

(साभार : प्रो. बी.वै. ललितांबा)

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