Wednesday, February 21, 2024
Homeलोक कथाएँकर्नाटक की लोक कथाएँहौवा : कर्नाटक की लोक-कथा

हौवा : कर्नाटक की लोक-कथा

Hauwa : Lok-Katha (Karnataka)

एक बस्ती थी, वहाँ एक गरीब इनसान रहता था। उसके दो बेटियाँ थीं। दोनों बहुत सुंदर थीं।

उस इनसान की पत्नी कभी की मर गई थी तो उसने दूसरी एक औरत से शादी कर ली थी। दूसरी पत्नी के कोई संतान न थी, फिर भी वह इन लड़कियों को पसंद नहीं करती थी।

एक दिन की बात है। गाँव के मुखिया की बेटी की शादी थी। वह इनसान उस शादी में जाता है। वहाँ भोज में सज्जप्पा नाम की एक मिठाई बनी थी। उसे वह बहुत अच्छी लगती है। वह घर लौटकर पत्नी से सज्जप्पा बनाने की माँग करता है। पत्नी कहती है कि उसे बनाने में काफी चीजें लगती हैं, उन्हें दुकान से लाना पड़ता है। लाकर देने पर वह सज्जप्पा बनाकर खिला सकती है।

गरीब इनसान, जेब खाली। सज्जप्पा खाने का बहुत मन कर रहा है। अब वह क्या करे? दुकान के पास गया। दुकान के मालिक से मुफ्त में माँगने पर उसने मना कर दिया। फिर क्या करे?

दुकान में सामान देनेवाले लड़कों से माँगकर उसने चावल और मैदा इकट्ठा किया। गुड़ भी मिला, मगर सज्जप्पा तेल में तलकर गुड़ के पाक में बननेवाली चीज होती है।

गरीब इनसान, तेल कहाँ से लाता? उसे एक उपाय सूझा। वह दुकान में गया। दुकान में डिब्बों का मुँह काटकर तेल भरकर रखा था। उस इनसान की पीठ पर एक गमछा था। उस गमछे से उसने अपने सिर पर साफ बाँध लिया और सामने खड़े होकर तेल का भाव पूछने लगा। तभी एक दूसरा ग्राहक भी आया। दुकानदार उस पर ध्यान देने लगा। तभी इस इनसान ने अपना साफा तेल के डिब्बे में गिरा दिया। दुकानदार जैसे ही उसकी तरफ मुड़ा, उसने दुकानदार को गाली देना शुरू कर दिया। कहा, “तेल का डिब्बा एक तरफ रखा जाता है, सामने थोड़े ही रखते हैं, अब मेरा गमछा खराब हो गया।” उसकी गालियाँ सुनकर दुकानदार वास्तव में डर गया। माफी माँगने लगा।

फिर यह इनसान घर लौटकर आया। आकर अपने गमछे को निचोड़ा तो इसमें से करीब एक सेर (किलो भर) तेल निकला। उस तेल में तलकर सज्जप्पा को गुड़ के पाक में डाला। सज्जप्पा बन गया। अब सज्जप्पा को खाने की बारी थी। वह दूसरी पत्नी सौतेली माँ थी उन लड़कियों की। उनकी आँख बचाकर उसे/उन दोनों को सज्जप्पा खाना था तो उसने क्या किया, रसोईघर का दरवाजा बंद कर अपने मियाँ को परोसकर खुद भी खाने लगी।

लड़कियों को सज्जप्पा की गंध मिली तो वे सौतेली माँ से माँगने लगीं। उस सौतेली माँ ने विवश होकर दोनों को एक-एक टुकड़ा खिला दिया।

अगली सुबह फिर वही हुआ तो सौतेली माँ ने किसी तरह इन लड़कियों से पिंड छुड़ाना चाहा। किसी तरह अपने पति को मनाकर रात को सोते वक्त उन दोनों लड़कियों को उठाकर जंगल छोड़ आई।

दोनों जंगल में रहती हैं। यह सोचकर कि माँ-बाप, दोनों ने उनके साथ धोखा किया, वे जंगल में में चलती जाती हैं।

तभी छोटी लड़की को प्यास लगती है। आगे एक पग भी चलना मुश्किल हो जाता है। वह वहीं बैठ जाती है। बड़ी लड़की चिंता और घबराहट में चारों तरफ देखती है।

तब उसे थोड़ी दूर पर एक मकान दिखाई देता है। वहाँ से पानी माँग लाने के उद्देश्य से वह उस मकान के पास आती है। उस मकान के चबूतरे पर एक घड़ा रखा होता है। उस घड़े में पानी भरा रहता है।

वह क्या करती है कि उसे छोटी लड़की की प्यास बुझाने के उद्देश्य से उठाती है। घड़ा उठाते ही वह उस लड़की को मकान के अंदर ले जाती है। वह वहाँ पर भी जाकर घड़े के अंदर हाथ डालती है। तब वह उसे एक कमरे के अंदर ले जाती है। वह वहाँ पर भी जाती है। वहाँ से घड़ा उसे एक और कमरे के अंदर ले जाता है। वहाँ पर एक राजकुमार मृत पड़ा रहता है। उस राजकुमार के बदन में एक हजार सुइयाँ चुभी होती हैं। उस लड़की को उसे देखकर डर लगता है। राजकुमार के शरीर के पास एक कागज पड़ा होता है। यह लड़की कौतूहल से वह कागज उठाती है। उस कागज पर यह लिखा रहता है कि उस राजकुमार के शरीर पर चुभी सुइयों को एक-एक कर बाहर निकालकर सात हाँड़ी पानी गरम कर, सात टंकी भर तेल मलकर, सात टंकी भर शिकाकाई घोलकर इस राजकुमार को नहलाने पर वह फिर से जिंदा हो जाएगा। लड़की पत्र की बात पढ़कर खुश जाती है और सुइयाँ निकालना शुरू करती है।

और इधर, जहाँ छोटी लड़की बैठी रहती है, वहाँ पर एक राजा शिकार के लिए जंगल में आता है। तब तक वह लड़की प्यास से मूर्च्छित हो जाती है। उसे देखकर वह राजा मोहित हो जाता है। वह लड़की इतनी रूपवती है कि राजा उसे उस हालत में छोड़कर जाने को तैयार नहीं होता। उसके पास एक चमड़े का थैला होता है, जिसमें उसके लिए पीने का पानी रखा है। उसी पानी से वह बेहोश लड़की के चेहर पर पानी छिड़कता है। पानी पड़ते ही लड़की ‘ओफ!’ कहकर उठ बैठती है।

राजकुमार को अपने सामने देखकर वह लड़की शरम से अपना सिर झुका लेती है और अपनी सारी कहानी उसे सुनाती है। बहुत देर तक बड़ी बहन के न लौटने पर उसे लगता है कि दीदी कहीं चली गई। अकेली बैठकर वह क्या करती? राजकुमार के साथ वह उसके गाँव चली जाती है।

अपने राज्य में लौटकर राजकुमार उस लड़की से शादी कर लेता है।

इधर बड़ी लड़की खूब मन लगाकर राजकुमार के बदन से सुइयाँ निकालने में लगी रहती है। अभी पचास के करीब सुइयों को बाहर निकालना बचा रहता है।

शाम का वक्त था। वह अपने बाल सँवारती छत पर खड़ी भी है। तभी वहाँ पर मछुआरा अपनी पत्नी पर किसी कारणवश गुस्सा होकर उसकी पिटाई कर घर से बाहर निकाल देता है।

यह घटना घटने पर उसकी जानकारी मिलते ही बड़ी लड़की उसे अपने साथ लिवा लाती है, अपने साथ रख लेती है।

तब तक फिर राजकुमार के बदन से सभी सुइयों को निकालने का काम भी पूरा हो जाता है। पत्र की सूचनानुसार सात हाँड़ी पानी गरम कर, सात टंकी भर तेल मलकर, शिकाकाई से नहलाती है तो राजकुमार सचेत होकर उठ बैठता है।

उसके सचेत होने के साथ बड़ी लड़की शरमाकर दूर खड़ी हो देखती है।

जैसे ही राजकुमार प्राणवान् होकर आँख खोलता है, उसके आगे मछुआरे की बीवी बैठी दिखती है।

राजकुमार को यह वहम होता है कि उसी औरत ने उसे दुबारा सप्राण बनाया है। वह मछुआरे की घरवाली का हाथ पकड़ता है। तब भी बड़ी लड़की अपना मुँह खोलकर नहीं बताती कि उसने (खुद ने) ही उसे बचाया है।

इसी तरह दिन बीतते रहते हैं। एक दिन राजकुमार कहीं बाहर गाँव के लिए निकलता है। निकलने से पहले वह इन दोनों महिलाओं से पूछता है कि इनकी पसंद की कौन सी चीज लानी है।

मछुआरे की पत्नी तो अपनी पसंद के गहने आदि माँग लेती है, मगर वह लड़की ऐसी कोई चीज नहीं माँगती, मगर उससे एक हौवा लाकर देने को कहती है।

राजकुमार की समझ में नहीं आता कि वह लड़की सबकुछ छोड़कर एक हौवा ही क्यों माँग रही है। खैर, वह चला जाता है। लौटते समय याद से दोनों की माँगी चीजें खरीदता है, फिर उन्हें ला देता है।

मछुआरे की पत्नी वे गहने पहनकर बहुत खुश होती है। लड़की को हौवा देकर पूछता है कि उसने अपने लिए यह अजीब चीज क्यों मँगाई? तब बड़ी लड़की अपनी सारी कहानी उसे सुनाकर कहती है कि मेरा जीवन ही एक हौवा है। मेरे जीने का कोई विशेष अर्थ नहीं। वह राजकुमार के हाथ एक तलवार देकर कहती है कि इससे उसे काट दे।

राजकुमार लड़की की कहानी से बहुत प्रभावित होता है। मछुआरे के पास उसकी पत्नी को पहुँचाकर सुखी जीवन जीने का आदेश देता है।

लड़की से शादी कर उसे अपने राज्य में ले जाता है। वहाँ जाने पर उसके भाई छोटे राजकुमार के साथ छोटी लड़की को देखकर खुश होता है।

दोनों भाई शादियाँ रचकर सुखी जीवन जीते हैं।

(साभार : प्रो. बी.वै. ललितांबा)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments