Thursday, February 29, 2024

जुरमाना : तमिल लोक-कथा

Jurmana : Lok-Katha (Tamil)

सरगुनम और कृष्णन दोनों दोस्त थे। लँगोटिया यार थे। सरगुनम कुशाग्र बुद्धि का मेहनती इनसान था तथा विषयों की गहराई में तुरंत पहुँच जाता था। यद्यपि वह मेहनत से जी नहीं चुराता था, किंतु कभीकभी आलस्य कर जाता था। कृष्णन विषयों की गहराई में जाने में रुचि नहीं रखता था। वह उतना ही पढ़ता और समझता था, जिनते में वह प्रथम नहीं तो द्वितीय श्रेणी में पास हो सके। सरगुनम अपने दोस्त कृष्णन के विपरीत था, वह हमेशा कक्षा में प्रथम आता था।

समय के साथ-साथ दोनों की मित्रता भी गहराती गई। कॉलेज के बाद दोनों ने नौकरी ढूँढ़ना शुरू किया। संयोग की बात है कि दोनों को एक ही प्राइवेट प्रतिष्ठान में नौकरी मिल गई।

स्वभावतगत विशेषताओं के कारण सरगुनम पदोन्नति करने लगा। उसका वेतन भी कृष्णन से दुगुना हो गया। कृष्णन जहाँ था, वहीं रहा। वह चाहता अवश्य था कि पदोन्नति कर बड़ा अफसर बने, पर उसके अनुरूप बढ़ नहीं पा रहा था। फलस्वरूप, कृष्णन के मन में ईर्ष्या जन्म लेने लगी। इस मन:स्थिति का प्रभाव दोस्ती पर पड़ना स्वाभाविक था।

सरगुनम हदय से चाहता था कि कृष्णन भी उन्नति करे और यथासंभव समय-समय पर उसकी मदद भी करता था। किंतु कृष्णन की कार्य शैली को बदलना कठिन था। सरगुनम महसूस कर रहा था कि कृष्णन के मन में पदोन्नति की लालसा समाई हुई और चूँकि वह उसे प्राप्त नहीं कर पा रहा है, ईर्ष्याग्रस्त हो उससे दूर-दूर रहने का प्रयत्न करने लगा है। वह दुःखित था कृष्णन के इस व्यवहार से।

सरगुनम एक दिन चेन्नईराम के पास पहुँचा और सारी स्थितियों से उसे अवगत कराया। चेन्नईराम कॉलेज में इन दोनों का सहपाठी रह चुका था। वे दोनों ही उसकी समझदारी के प्रशंसक थे। चेन्नईराम ने एक योजना के तहत दोनों को अपने घर भोज पर आमंत्रित किया। भोज पर इधर-उधर की बातें के पश्चात् एक कार्यक्रम रखा था लोककथा सुनने का। कृष्णन और सरगुनम ने अपनी-अपनी कथा सुनाई। जब चेन्नईराम की बारी आई तो उसने कहा, ‘मैं तुम दोनों को एक लोककथा सुनाता हूँ, शर्त यह है कि तुम इसमें निहित संदेश को समझने की कोशिश करना।’

दोनों ने अपनी स्वीकृति दी और तब चेन्नईराम ने कहना शुरू किया-

ग्रीष्म ऋतु में लू के थपेड़ों से घबराबर जब लोग घर से नहीं निकलते, तब दो दोस्त कुप्पन और सुब्बन यात्रा पर थे। राह में झरना था, स्वच्छ पानी का तालाब देखकर किसी पेड़ तले वे बैठकर खाना खाते और शेष भविष्य के लिए बचाकर रख लेते। दो दिन बीत गए। एक दोपहर उन्हें थकान महसूस हुई तथा भूख भी सताने लगी। उन्होंने आस-पास देखा किंतु जल का भी स्रोत नहीं दिखा। बिना जल खाना भी यदि मिल जाए तो उसे खाना कठिन था।

‘सहपथिको’! मेरे खाने की पोटली बंदर झपटकर ले गया है। मैं दो दिन से भूखा हूँ। क्या आप मुझे अपने भोजन से कुछ दे सकते हैं। मैं आपका एहसानमंद रहूँगा।’ अचानक एक यात्री ने आकर इन दोनों से पूछा।

उन्हें उस यात्री से सहानुभूति हो गई थी। वे बोले, ‘खाना तो हम लोग बाँट सकते हैं, किंतु पीने के लिए जल भी होने से।’

‘जल! वह तो मेरे पास पर्याप्त है।’ यात्री ने कहा और अपने थैले से पानी की भरी बोतल निकाली। तीनों एक स्थान पर बैठ गए। कुप्पन के पास तीन इडली थी, सुब्बन के पास दो। उन पाँच इडलियों को उन्होंने अपने बीच रख लिया, साथ ही जल की बोतल भी, और आराम से भोजन किया। भोजन के पश्चात् उन्होंने कुछ देर आराम किया। चूँकि उस यात्रा की राह अलग थी, उसने जेब से चाँदी के पाँच सिक्के निकाले और उन दोनों के बीच रखकर कहा, ‘मैं आप लोगों का आभारी हूँ। मेरी ओर से यह तुच्छ भेंट स्वीकारें।’ यह कहकर उसने अपनी राह पकड़ी।

कुप्पन ने उन चाँदी के सिक्कों में से दो सिक्के सुब्बन को दिए और शेष तीन स्वयं ले लिये। सुब्बन को अच्छा नहीं लगा। उसने कहा, ‘मुझे आधा सिक्का और दो। दोनों का बराबर-बराबर हिस्सा होना चाहिए।’

कुप्पन ने कहा, ‘तुम्हारी दो इडली थी, मेरी तीन। मैंने उस हिसाब से बाँटा।’

पर सुब्बन ने यह तर्क नहीं माना। वह क्रोधित हो झगड़े पर उतारू होने लगा। उसका तर्क था कि दोनों को बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए।

कुप्पन ने उसे शांत करते हुए सुझाव दिया, ‘देखो, हम कुछ ही घंटों पश्चात् अपने गंतव्य पर पहुँचने वाले हैं। वहाँ के मुखिया से हम फैसला करा लेते हैं।’

तीन-चार घंटों के बाद वे अपने नियत स्थान पर पहुंच गए। पहुँचते ही वे सीधे ग्राम-मुखिया के पास गए। उन्होंने मुखिया को शुरू से अंत तक की सारी घटना वर्णित की। मुखिया ने धैर्यपूर्वक उन्हें सुना।

पूरी बात सुनकर मुखिया ने कहा, ‘तुम दोनों के पास कुल मिलाकर पाँच इडली थीं। जिसे तुमने तीन हिस्सों में बाँटा। क्या बता सकते हो किस अनुपात में?’

‘बिल्कुल बराबर-बराबर एक ही अनुपात में श्रीमान जी।’ दोनों ने कहा, ‘क्या तुम्हें विश्वास है।’

‘जी हाँ, बिल्कुल समान मात्रा में।’ सुब्बन ने कहा।

मुखिया ने कुछ क्षण सोचा और कहा, ‘तब सुब्बन, तुम अपने सिक्कों में से एक सिक्का कुप्पन को लौटा दो, इससे हिसाब बराबर हो जाएगा।’ मुखिया ने अपना फैसला सुनाया।

इस निर्णय से सुब्बन और चिढ़ गया। पर यह भाव चेहरे पर नहीं लाते हुए उसने मुखिया से कहा, ‘उस अनजान पथिक को मैंने समान हिस्सा दिया था, तो क्या मुझे समान हिस्सा इन सिक्कों में नहीं मिलना चाहिए, मुखियाजी? मेरा निवेदन है, आप अपने निर्णय पर पुनः विचार करें।’

‘इसमें पुनः विचार के लिए कोई आवश्यकता नहीं है।’ मुखिया ने कहा, ‘फिर भी मैं तुम्हारी संतुष्टि करूँगा।’

‘तुम कहते हो, तुमने पाँच इडलियों को समान बाँटा, ठीक है।’

‘हाँ जी!’

‘अब समझो, यदि एक इडली को तीन व्यक्तियों में बाँटना है तो उसके तीन भाग करने होंगे, ठीक है।’

‘जी, मुखियाजी।’

‘तो कुप्पन तुम बताओ। तुम्हारे पास कितने टुकड़े होंगे?’

‘जी, तीन गुणा तीन-नौ भाग।’

‘और सुब्बन, तुम्हारे पास?’

‘जी, तीन गुणा दो-छह भाग।’ सुब्बन ने कहा।

‘तो मिलकर कुल कितने भाग हुए?’

‘जी, नौ जमा छह कुल 15। ‘ दोनों ने कहा।

‘अब यदि इन पंद्रह टुकड़ों को तीन सम भाग में बाँटें तो प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में पाँच टुकड़े आएँगे, सही है।’

‘बिल्कुल सही।’ सुब्बन ने कहा।

‘तो फिर सुब्बन तुम ही बताओ। कुप्पन ने अपने पाँच टुकड़े रखकर उस यात्री को कितने टुकड़े दिए?’

‘जी नौ में से पाँच घटाए, तो चार! चार टुकड़े।’

‘अब तुमने अपने हिस्से के पाँच टुकड़े रखकर उस यात्री को कितने टुकड़े दिए?’

‘जी, छह में से पाँच घटाकर…।’ और सुब्बन यहीं रुक गया। उसने अपनी जीभ काटी।

‘हाँ, बोलो बोलो।’ मुखिया ने कहा।

‘जी एक।’ सुब्बन बोला

‘तो अब तुम मानते हो, मैंने जो निर्णय दिया, वही सही है।’

‘जी मुखियाजी।’ ऐसा कहकर सुब्बन ने अपने दो सिक्कों में से एक सिक्का कुप्पन को लौटा दिया। अब वे वापस जाने के लिए मुड़े ही थे कि मुखिया ने कहा, ‘ठहरो।’ दोनों वहीं रुक गए।

‘तुम्हारे पास इडली थी, किंतु पीने का पानी नहीं था। उस सहयात्री के जल से तुम लोगों ने अपनी प्यास बुझाई। दूसरे शब्दों में, उसने तुम्हारी इडली के बदले में जल दिया। इसलिए तुम्हारा नैतिक दायित्व यह था कि तुम उससे ये पाँच सिक्के नहीं लेते। किंतु तुम दोनों ने ऐसा नहीं करके अपराध किया है, जिसका दंड तुम्हें मिलना चाहिए। दंड-स्वरूप तुम दोनों एक-एक सिक्का ग्राम पंचायत को जुरमाने के रूप में दो।’ मुखिया ने एक और फैसला सुनाया।

उन दोनों दोस्तों के पास जुरमाना भरने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था। उसके लालच के कारण वह भी हाथ से खिसक गया।

कृष्णन ने लोककथा के संदेश को पहचाना। उसे लगा, वह गलत था, संतोष ही सबसे बड़ा धन है। बेकार में ईर्ष्या करके उसने अपनी मनोवृत्ति दूषित की। पश्चात्ताप भरी आँखों से उसने सरगुनम को देखा।

सरगुनम ने मित्र को हृदय से लगाने के लिए अपनी बाँहें फैला दीं।

(साभार : डॉ. ए. भवानी)

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