Sunday, February 25, 2024

तुला-भार : तमिल लोक-कथा

Tula-Bhaar : Lok-Katha (Tamil)

तमिलनाडु की लोक-परंपरा में आध्यात्मिक कथाओं पर आधारित लोककथाएँ भी प्रचलित हैं। यहाँ ऐसी ही एक लोककथा मैं दे रही हूँ, जो भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारका दरबार से संबंधित है।

संपूर्ण द्वारका के प्रजाजन द्वारका नरेश श्रीकृष्ण को बहुत चाहते थे और उनकी सेवा करना अपना परम धर्म मानते थे। उनमें रुक्मणि, सत्यभामा के अतिरिक्त जामवंती भी अपने निजी काम छोड़कर श्रीकृष्ण की सेवा करने का आनंद उठाते थे। सत्यभामा उन तीनों में सबसे सुंदर राजकुमारी थी, जो सत्यजित की लाड़ली पुत्री थी, और उसे अपने धनवान होने का अभिमान भी था। परंतु श्रीकृष्ण की पहली पत्नी की पदवी प्राप्त रुक्मणि बहुत शांत, सभ्य, सुशील और सरल स्वभाव की थी। वह श्रीकृष्ण पर अपार भक्ति रखने वाली सुशील महिला थी। एक दिन जामवंती अपनी दीदी रुक्मणि के पास आकर कहती है, ‘दीदी, जब भी हम लोग श्रीकृष्ण की सेवा के लिए प्रस्तुत होते हैं, तब पता नहीं कहाँ से सत्यभामा टपक पड़ती है और बीच में आकर अपना टाँग लगाती है।’

जामवंती के क्रोध को शांत करती हुई, रुक्मणि बड़े सरल स्वर में कहती है और समझाती भी है’सत्यभामा को अन्यथा मत ले, वह धनवान है, भोली है, उसे सत्य को समझने में अभी बहुत समय लगेगा।’

‘परंतु दीदी, श्रीकृष्ण को तो आपके कमरे में अब तक आ जाना था, देखो तो, वह अभी तक अपने कमरे में उन्हें रुकाए रखी है।’ जामवंती ने कुछ क्रोधित होकर कहा।

‘कोई बात नहीं, जामवंती। मेरे स्वामी तो मेरे हृदय में सदैव निवास करते हैं। जब भी वे चाहें, मेरे पास आ सकते हैं, तुम चिंता मत करो।’ रुक्मणि ने प्यार से उसे सांत्वना दी। कुछ दिन यों ही बीत गए।

एक दिन द्वारका दरबार में नारद मुनि का प्रवेश होता है। उन्होंने दरबार में प्रवेश होने के पूर्व सत्यभामा को वहाँ के बगीचे में खिले पुष्पों का आनंद उठाते हुए देखा और उसके पास पहुंच गए।

‘नारायण ! नारायण !! राजकुमारी सत्यभामा को मेरा नमन। मेरा यहाँ आने पर संदेह मत करो, दरअसल मैं बूढ़ा हो चला, सोचा भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन कर आऊँ, बस आपको देखा और यहाँ चला आए। अच्छा, आज-कल आप के प्रेम की चर्चा चल रही है, बस मैं जानना चाहता हूँ कि श्रीकृष्ण पर आप का प्यार ज्यादा है या रुक्मणि का?

अचानक इस प्रकार का प्रश्न पूछने पर सत्यवती आश्चर्य में पड़ जाती है और पूछती है, ‘मैं समझी नहीं! नारदजी, आप यह प्रश्न क्यों कर रहे हैं?

मुसकराते हुए नारद मुनि बोले, ‘अरे! संपूर्ण द्वारका में उनके प्यार की कहीं तो चर्चा हो रही है। परंतु आप रुक्मणि से ज्यादा सुंदर हैं, आप छोटी रानी ही सही, पर हमें लगता है कि यह पर्याप्त नहीं, श्रीकृष्ण को अपने बस में रखने के लिए कुछ करना पड़ेगा।’

नारद की बातें सुन सत्यभामा ने उत्सुकता के साथ पूछा, ‘नारदे ! आप ही बताइए, उनका पूरा ध्यान मेरी ओर खींचने के लिए हमें क्या करना होगा?’

नारदजी खुश होकर बोले, ‘मैं इसलिए तो यहाँ आया हूँ। आपको एक संकल्प लेना पड़ेगा अपने प्यार को साबित करने हेतु। इसमें यदि तुम जीत गईं तो ठीक है, नहीं तो आपको मेरे अधीन श्रीकृष्ण को सौंप देना होगा। बोलो शर्त मंजूर है ?’

‘ठीक है, नारदजी। बताइए, मुझे क्या करना होगा?’ सत्यभामा ने पूरे विश्वास के साथ शर्त को स्वीकारा।

‘मैं सोचता हूँ, आपके अपार प्रेम को साबित करने के लिए, उनके मन को पिघलाने वाला कुछ काम होना चाहिए-(सोचते हुए) हाँ! क्यों न आप उनके भार के अनुरूप अपना संपूर्ण हीरे-मोती आभूषणों को रखकर अपने प्यार को सिद्ध करें। यदि सफलता मिली तो उनका प्यार आप की ओर दुगुण हो जाएगा। और वे आपको पहले से अधिक चाहने लगेंगे। आपको मेरी बातों पर यदि विश्वास है या भरोसा है तो शुरू कर दीजिए।’

सत्यभामा को अपने प्यार पर भरोसा था, अतः बिना सोचे-समझे शर्त को स्वीकारते हुए नारद मुनि से बोली, ‘क्यों नहीं? आप पर मुझे पूरा विश्वास है। आप कैसे मुझे धोखा दे सकते हैं? असंभव मुनिजी! मैं सत्यजित की कन्या हूँ, मेरे पास अपार धन-दौलत है। आप निश्चिंत रहिए, इसका प्रबंध मैं शीघ्र करती हूँ।’ कहते हुए सत्यभामा नारद मुनि का संदेश लेकर श्रीकृष्ण से मिलने भीतर गई। नारदजी को दिए वचन को भी बताते हुए उनसे तुला-भार की स्वीकृति माँगी।

संपूर्ण बातों को सुनकर श्रीकृष्ण बोले-‘सत्यभामा, यह तुमने क्या किया? सचमुच में तुम मुझे नारद मुनि के हाथों सौंपने वाली हो क्या?’

‘घबराइए मत नाथ, मैं जानती हूँ सबकुछ, नारद मुनि से चर्चा करके ही यह योजना बनाई है।’

श्रीकृष्ण ने उसे सावधान करते हुए कहा, ‘नारदजी पर आवश्यकता से अधिक तुम्हारा विश्वास ठीक नहीं है। यदि तुम हार गईं तो मैं नारद के साथ चला जाऊँगा, तब तुम क्या करोगी?’

‘नाथ, मुझे अपने पर पूरा भरोसा है। आपको नारदजी के हाथ मैं कभी नहीं सौंपूँगी, निश्चिंत रहिए। नारदजी भी मुझे धोखा नहीं देंगे।’ सत्यभामा का विश्वास भरा स्वर सुनकर श्रीकृष्ण तैयार हो गए ‘तुलाभार’ के लिए।

सत्यभामा की बातें सुनकर नारदजी बोल पड़े, ‘नारायण! नारायण !! मैं क्यों राजमाता को धोखा दूंगा।’

द्वारका प्रजाजन के समक्ष श्रीकृष्ण के प्रति अपने प्यार को साबित करने के लिए सत्यभामा ने तुलाभार का आयोजन तुरंत किया, श्रीकृष्ण को नारद मुनि के हाथ सौंप दिया और भरी सभा में ऐलान करते हुए कहा, ‘नारद मुनिजी, मैंने जैसे वचन दिया है, वैसे ही पहले मैं अपने स्वामी श्रीकृष्ण को आपके हाथों सौंपती हूँ।’ प्रजाजन जो इसे देख रहे थे, सब आश्चर्य में पड़ गए।

श्रीकृष्ण ने दोबारा सत्यभामा से कहा, ‘सोच लो सत्यभामा, तुमने जो वचन दिया है, उसे तुम वापस ले नहीं सकतीं, अभी भी समय है। अपना इरादा बदल सकती हो।’

‘आप घबराइएगा नहीं नाथ। आप हर क्षण, हर पल मेरे नयनों में समाए हैं। आपको मैं खो नहीं सकती।’ सत्यभामा की दृढ़ आवाज उभरी।

‘धन्यवाद, धन्यवाद, माता श्री!’ नारद मुनि ने उत्तर में कहा और कार्यक्रम शुरू हुआ।

अपने वचन को निभाती हुई एक बड़ा सा तराजू सभा के बीच खड़ा किया। अपने स्वामी श्रीकृष्ण एक ओर बैठ गए। दूसरी ओर सत्यभामा ने अपने गहने चढ़ाने लगी। उसके पास के सभी आभूषण उसने पलड़े में चढ़ा दिए, अब कुछ भी बाकी नहीं था उसके पास। पर तुला भार हिला ही नहीं। श्रीकृष्ण का भार अधिक ही रहा। उसने बार-बार आज्ञा दी और गहने अंदर से लाने की, पर जितना चढ़ाते जाते हैं, उतना कम पड़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आता है क्या करें। उसके सारा धन समाप्त हो गया। चिंता की रेखा सत्यभामा के माथे पर उभर आई।

नारदजी बीच-बीच में उन्हें याद दिलाते जा रहे थे, ‘माता श्री, यदि कृष्ण के भार के बराबर आपने आभूषण नहीं रखा तो सदा के लिए श्रीकृष्ण मेरे अधीन हो जाएंगे। फिर बाद में पश्चात्ताप नहीं करना।

प्रजागण तमाशा देख रहे थे। श्रीकृष्ण बोल पड़े, ‘नारदजी, आप भी यहाँ आनंद उठाने आए हैं शायद।’

‘नारायण! नारायण!! नाटका का सूत्रधार कौन है ? क्या आप नहीं जानते?’ नारदजी ने नाटकीय ढंग से उत्तर दिया।

यहाँ सत्यभामा को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या करें। घबराते हुए कहने लगी, ‘नहीं, नहीं नारदजी! भगवान् के लिए ऐसा मत कहिए। मैंने अपना सारा धन भगवान् को सौंप दिया है।’

‘ये सब मेरी मूर्खता के कारण हुआ है,’ श्रीकृष्ण ने कहा। मैं नारद मुनि के अधीन होने जा रहा हूँ। यह सब भाग्य का खेल है।’

सत्यभामा रोने लगी और इस दुविधा से मुक्त पाने का उपाय पूछने लगी।

नारदजी ने कहा, ‘सत्यभामाजी, आप इसको सुलझाने के लिए क्यों नहीं रुक्मणि भाभी की सलाह लेती हैं।”

कोई दूसरा चारा न देखकर सत्यभामा रुक्मणि दीदी के पास जाती है। रोते हुए दरबार में हुई सारी घटना से उन्हें अवगत कराती है।

जामवंती क्रोधित होकर कहने लगी, ‘हमारे पति को दान देने वाली तुम कौन होती हो?’

रुक्मणि ने शांत स्वर में कहा, ‘जामवंती, धीरज रखो, घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा। चलो, हम सब वहाँ चलते हैं और श्रीकृष्ण को वापस, नारदजी से ले लेते हैं।’

तीनों वहाँ से प्रस्थान करती हैं। रास्ते में एक तुलसी का पौधा गमले में देखा, और रुक्मणि ने एक पत्ता तोड़कर दरबार में आ जाती है। तुला-भार के स्थान पर पहुँचते ही बहुत शांतिपूर्वक रुक्मणि तुलसी के पत्ते को उस तराजू में रखती है, जहाँ गहने रखे गए थे और भगवान् से प्रार्थना करने लगती हैं।

तभी वहाँ एक अद्भुत चमत्कार हुआ। जो तराजू हिल ही नहीं रहा था, अब धीरे धीरे नीचे आने लगा, समतुल्य नहीं हो पा रहा था। तभी श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा, ‘कृपया, तुम अपने गहने तराजू से निकाल दो।’

सत्यभामा ने वैसे ही किया। जैसे-जैसे वह गहनों को निकालती गई, पलटा समतुल्य के लिए नीचे आने लगा। अब तराजू में मात्र रुक्मणि का रखा तुलसी का पत्ता था, जो कृष्ण के भार से भी ज्यादा भारी निकला।

सब आश्चर्य से देख रहे थे। सत्यभामा कुछ भी बोल नहीं पाई। श्रीकृष्ण तराजू से उतरकर सत्यभामा के पास गए और प्यार से कहने लगे-‘मेरे लिए तुमने अपना संपूर्ण धन दिया, परंतु उसमें भक्ति का अभाव रहा, मात्र अहंकार ही रहा, अर्थात् मुझे जीतने के लिए तुमने अपना धन पर्याप्त माना, परंतु रुक्मणि के पास कुछ भी नहीं है, जो मुझे देती, हाँ, पर सच्चा प्यार, स्नेह और भक्ति मुझ पर कूटकूटकर उसमें भरी है। उसी का प्रमाण है तुलसी का पत्ता। अपने धन पर गर्व करना छोड़ दो।’

सत्यभामा का सिर शर्मिंदगी से झुक गया।

(साभार : डॉ. ए. भवानी)

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