Sunday, February 25, 2024
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पसीने की कमाई : तमिल लोक-कथा

Paseene Ki Kamai : Lok-Katha (Tamil)

नेताजी ने आमंत्रित किया था चेन्नईराम को।

प्रश्न और शंकाओं से घिरा, उधेड़बुन में डूबा चला जा रहा था वह उनकी विशाल कोठी की ओर। नेताजी उसे उपकृत करना चाह रहे थे। वह सोच रहा था, सोच ही नहीं, खो गया था एक लोककथा में, जिसमें एक राजा था, ब्राह्मण था और उसकी पत्नी।

उस राज्य की परंपरा थी कि नववर्ष तथा अन्य त्योहारों पर राजा वस्त्र, अनाज, धन आदि दान करता था। उस दिन तमिल नववर्ष था। राजा हर्ष और उल्लसास से धर्मार्थ कार्य में लगा हुआ था अपने राजमहल के बाहर विशाल प्रांगण में, वहीं दूर एक पेड़ की छाँव में एक ब्राह्मण बैठा यह सब देख रहा था।

दिन ढलते-ढलते दान ग्रहण करने वालों की पंक्ति जब समाप्त हो गई तो राजा ने उस वृक्ष की ओर देखा। वह ब्राह्मण धीरे से उठा और राजा के सम्मुख आ खड़ा हुआ। राजा ने उसे करबद्ध प्रणाम किया और विनम्र शब्दों में पूछा, ‘विप्रवर, आज्ञा दीजिए। मैं आपकी क्या सेवा करूँ? वस्त, आभूषण, अनाज या कोई और इच्छि वस्तु?’

ब्राह्मण ने कहा, ‘हे राजन! ये वस्त्र, आभूषण, धन-धान्य सभी जनता के परिश्रम का फल है, जो आपकी संपत्ति के रूप में आपके भंडारों में कैद है। त्योहार-उत्सवों पर आप मुक्त-हस्त से इसे ही धर्मार्थ के नाम पर अपनी प्रजा को लौटाते हैं और प्रजा का अनुग्रह प्राप्त कर उसके मुख से निकली जयकार से मुदित हो आत्मसंतोष पाते हैं, अपने अहं की संपूर्ति करते हैं।’

राजा ऐसे निर्भीक वचन सुनकर उस निडर ब्राह्मण का मुख निहारने लगा, जो अपनी तेजस्विता से दिपदिपा रहा था। कुछ क्षण विचार के पश्चात् राजन ने विनीत भाव से कहा, ‘विप्रवर! आप का कथन सत्य प्रतीत होता है। परंतु मुझे आपकी सेवा का अवसर अवश्य दे।’

ब्राह्मण ने कहा, ‘राजन! मैं तुम्हारी भावना को समान देता हूँ! यदि तुम्हारे पास अपने पसीने की कमाई से अर्जित धन या वस्तु हो तो मुझे स्वीकार होगी।’

‘क्षमा करना विप्रवर! स्वयं के परिश्रम से अर्जित कुछ भी नहीं है मेरे पास इस समय।’

‘तो फिर ठीक है राजन। मैं चलता हूँ। और ऐसा कहकर वह ब्राह्मण अपने गंतव्य की दिशा में मुड़ गया।

राजा को क्षोभ हुआ। उसके महल से कोई बिना कुछ प्राप्त किए वापस जाए, विशेषकर ब्राह्मण! यह उसके लिए लज्जा की बात है। उसने कुछ विचार किया मन में और ब्राह्मण को पुकारा, ‘रुक जाओ विप्रवर!’

ब्राह्मण पीछे मुड़ा, उसने राजा को देखा।

‘विप्रवर! कृपया कल शाम इसी समय पुन: दर्शन दीजिए, मेरा अनुरोध है।’ ब्राह्मण ने सहमति प्रकट की और एक धर्मशाला में जाकर ठहर गया।

राजा चिंता में पड़ गया। उसे अपना वचन निभाना था। दूसरे दिन वेश बदलकर, बिना किसी को सूचित किए अपने राज्य में निकल गया। उसने अनेक स्थानों में जाकर लोगों से काम माँगा, किंतु सफल नहीं हुआ। अंत में वह समुद्र किनारे पहुँचा।

उसने देखा, शहतीरों से बनी नाव में मछुआरे जाल लेकर समुद्र में मछली पकड़ने जा रहे हैं। उसने मछुआरों से अनुरोध किया कि वे उसे अपने साथ काम पर रख लें, जो भी मजदूरी देंगे, उसे वह मंजूर होगी। मछुआरों ने उसे झिड़क दिया, किंतु एक मछुआरे को उस पर दया आ गई। उसने कहा, ‘एक बड़ी मछली पकड़ने पर एक पैसा और छोटी मछली का एक धेला मिलेगा, चलोगे? राजा ने तुरंत हामी भर दी और उसकी नाव पर जाल लेकर सवार हो गया। दोपहर ढलने लगी, राजा निराश हो चला। तभी उसे जाल कुछ भारी सा लगा। मछुआरे लौट आए। राजा के जाल में एक बड़ी मछली तथा एक छोटी मछली फँसी थी। वह एक पैसा और एक धेला लेकर महल लौट आया।

संध्या समय ब्राह्मण राजा के द्वार आया। राजा ने उसके हाथ में एक पैसा और एक धेला रखकर कहा, ‘यही मेरे पसीने की कमाई है। विप्रवर, आप चाहें तो इसे स्वीकारें।’

ब्राह्मण ने कहा, ‘राजन! पसीने की कमाई मनुष्य को आत्म-स्वाभिमान और आत्मबल प्रदान करती है। एक मनुष्य के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाती है, अत: श्रम करने में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए। तुम धन्य हो, राजा!’

चेन्नईराम ने देखा, वह नेताजी की वैभवशाली कोठी के सामने खड़ा है। बंदूकधारी संतरी उसे घूरते हुए उसका नाम व काम पूछ रहा है।

वह नेताजी के कक्ष में पहुँचा। नेताजी ने गर्मजोशी दिखाते हुए उसका हाल-चाल पूछा और सेवक को चाय लाने का आदेश दिया।

चाय-पान करते हुए नेताजी बोले, ‘चेन्नईराम! मेरे परिवार पर तुम्हारे पिता का अहसान है। गर्दिश के दिनों में उन्होंने बिना किसी अपेक्षा के हमारी मदद की थी। अब वे तो नहीं रहे। मैं उन एहसानों से मुक्त होना चाहता हूँ।’

‘मैं समझा नहीं’ चेन्नईराम ने कहा।

‘देखो, तुम पढ़े-लिखे हो, पत्रकार और लेखक हो।’

‘तो?’

‘तुम मेरे व्यक्तिगत सहायक बन जाओ।’

‘क्या काम होगा?’ चेन्नईराम ने पूछा।

‘कुछ खास नहीं, मैं बहुत सी संस्थाओं को दान में एक भारी रकम देता हूँ। इसके अलावा गरीबों में अन्न, वस्त्र बाँटकर उन्हें मदद करता हूँ। उनके बच्चों को स्कूल में एक टाइम मुफ्त खाना देता हूँ। इन सबके बावजूद विपक्ष-दल वाले मुझे बदनाम करते हैं। आरोप लगाते हैं कि घोटाले करता हूँ आदि-आदि।’

‘तो मैं इसमें किस प्रकार आपकी मदद कर सकता हूँ, आप के काम आ सकता हूँ?’

‘तुम लेखक और बुद्धिमान हो। अपने लेखों द्वारा तुम मेरी छवि सुधार अभियान चलाओगे। विपक्षियों की कमजोरियों को खोजकर मुझे बताओगे और मैं अपने भाषणों में उन्हें नंगा करूँगा।’

‘वो तो ठीक है नेताजी, पहले आप मेरी एक शंका का समाधान करें, फिर मैं आप के प्रस्ताव पर विचारूँगा।’

‘कहिए! तुम्हारा क्या प्रश्न है? क्या शंका है?’

चेन्नईराम के मस्तिष्क में पुन: वह लोककथा अवतरित हो गई, जिसमें डूबा वह नेताजी के द्वार तक पहुँचा था।

चेन्नईराम ने कहा, ‘आपके पिता ने और आपने गर्दिश के दिन देखे हैं! तो बताइए, आप जिस धन को दान कर रहे हैं, गरीबों में बाँट रहे हैं, अपने ऐशोआराम पर खर्च कर रहे हैं, क्या वह आपके पसीने की कमाई है?’

‘नेताजी ने इस प्रकार के वाहियात प्रश्न की अपेक्षा नहीं की थी। उन्हें लगा, इसका दिमाग या तो विपक्ष वालों ने फिरा दिया है या वह पागल हो गया है। फिर भी समाधान जरूरी था। बोले, ‘देखो चेन्नईराम, नेता बनना आसान नहीं है। क्या-क्या हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। गुंडों-शोहदों की सुननी पड़ती है, उन्हें पालना पड़ता है। जनता को भाषणों द्वारा चिकनी-चुपड़ी बातों में फँसाना पड़ता है। सपने दिखाने पड़ते हैं और जरूरत पड़े तो उन्हें आपस में बाँटना पड़ता है। इन सब सुकर्मों में पसीना ही नहीं आता, पसीने की धार नोटों और शराब की तरह बहानी पड़ती है। तब कहीं जाकर चुनाव लड़ते हैं, जीतते हैं और कुरसी की जोड़-तोड़ करते हैं। एक बार कुरसी हाथ आ जाए तो दौलत का अंबार लगता ही है, किंतु इस कुरसी की रक्षा के लिए भी पसीना बहाना पड़ता है। अब तुम ही बताओ, यह सब पसीने की कमाई है या नहीं?’

चेन्नईराम नासमझ सा नेताजी का मुँह ताकता उस अधूरी लोककथा के अंत में भटक गया।

ब्राह्मण देवता राजा से प्राप्त एक पैसा और एक धेला लेकर रात्रि में अपने गाँव लौटकर जब पत्नी के हाथों रखते हैं, तो वह अपने पति की बुद्धि से दिवालिया घोषित करती हुई क्रोध में उन सिक्कों को अपने घर के पिछवाड़े फेंक देती है, जहाँ कुछ समय पश्चात् वे सोने और चाँदी के सिक्कों से लदे पौधों में फल गए थे।

चेन्नईराम नेताजी के पसीने की कमाई के फल के बारे में सोचने लगा।

(साभार : डॉ. ए. भवानी)

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