Sunday, February 25, 2024
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बुद्धि-चातुर्य से रक्षा : तमिल लोक-कथा

Buddhi-Chaturya Se Raksha : Lok-Katha (Tamil)

कॉलेज की पढ़ाई समाप्त कर कृष्णन जीवन-यापन की राहों पर प्रवेश कर रहा था। वह अभी दुविधा की स्थिति में था कि कौन सी राह चुनी जाए। नौकरी या स्वयं की प्रतिभा से कुछ व्यापार। उसने अपने पिता चेन्नईराम से मार्गदर्शन का अनुरोध किया।

चेन्नईराम ने कहा, ‘पुत्र! नौकरी में भी प्रतिभा, लग्न एवं मेहनत चाहिए और व्यापार में भी। नौकरी यदि किसी निजी संस्थान में मिलती है तो उत्तम है, क्योंकि वहाँ पर व्यक्ति को उन्नति के अवसर रहते हैं।’ पर सरकारी नौकरी प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए नहीं, क्योंकि वहाँ प्रतिभा कुंठित हो जाती है और व्यक्ति को बनी बनाई लीक पर चलना पड़ता है। निजी व्यवसाय में प्रारंभ में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, किंतु इसमें यदि सफल हो जाए और ग्राहक का विश्वास जीत लिया तो फिर व्यापार प्रगति की पटरी पर दौड़ने लगता है। यह कार्य अथक परिश्रम का तो है ही, सृजनात्मक भी है, जिसमें आत्मसंतुष्टि, प्रतिष्ठा सभी मिलती है।’

‘तो फिर पापा, मैं व्यापार ही करूँगा।’ कृष्णन ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा।

‘देख लो, इसमें तुम्हारी तीव्र बुद्धि, प्रतिभा और चतुराई की पग-पग पर परीक्षा होगी, जैसे कि वेदपुरी के राजा की होती थी।’

‘पापा, यह वेदपुरी की क्या कथा है ? सुनाओ न। हो सकता है, मुझे इसमें भी कुछ मार्गदशन या प्रेरणा मिले।’

‘हाँ बेटा! हमारी तमिल लोककथाओं में कुछ-न-कुछ संदेश अवश्य निहित है।’

‘तो पापा, मुझे कथा सुनाओ न।’

‘अच्छा बेटा, सुनो-

‘दक्षिण के इस क्षेत्र में वेदपुरी नामक एक राजा था, जिसे आजकल पुदुचेरी के नाम से जाना जाता है। इस राज्य का राजा कुशाग्र बुद्धि की खान था, इसलिए आस-पास के राजा भी उसका सम्मान करते थे, यहाँ तक कि उन पर यदि कोई कष्ट आ पड़े तो वे उससे सलाह भी लेते थे।

एक बार दूरस्थ देश के समृद्धिशाली राजा ने उसे अपने राज्य में आमंत्रित किया। राजा भिखारी के वेश में वहाँ गया। उस राजा ने उससे पूछा, ‘तुम इस वेश में मुझे आश्चर्य देने के इरादे से आए हो या अन्य कोई कारण है, कृपया बताओ?’

वेदपुरी के राजा ने कहा, ‘तुम्हारे और मेरे राज्य के बीच राजा चिनचिन्ना का राज्य पड़ता है, जिसकी मुझसे शत्रुता है। मुझे उसके राज्य में से गुजरकर यहाँ आना था, जबकि उसके गुप्तचर तथा सैनिक मुझे खोज रहे थे। अब भला भिखारी पर कौन ध्यान देगा, यही सोचकर मैं इस वेश में यहाँ पहुँचा हूँ।’ और राजा हँस पड़ा।

‘हाँ, वह तो सच है, किंतु आप समुद्री मार्ग से भी तो आ सकते थे?’

‘हाँ! लौटने पर उसी मार्ग को अपनाऊँगा।’ राजा ने कहा।

कहीं प्रीतिभोज, तो कहीं नृत्यगान कार्यक्रम, पिकनिक, शिकार-भ्रमण तो कहीं अन्य आमोद-प्रमोद का आयोजन। इस प्रकार आनंद में वेदपुरी के राजा के दो दिन बीत गए। तीसरे दिन उन्हें राजदरबार की शोभा बढ़ाने का निमंत्रण मिला।

राजा ने दरबार में अपने आतिथेय राजा के समीप आसन ग्रहण किया। तभी दरबार में दो युवा स्त्रियों ने प्रवेश किया। उनके साथ एक परिचारिका भी थी, जिसकी बाँहों में दो नन्हे-मुन्ने थे।

हे अन्नदाता! उसमें से बड़ी स्त्री ने कहा, ‘मेरा नाम बेहम है और वह मेरे से दो वर्ष छोटी मेरी बहन बीवी है। हम दोनों ने दो भाइयों से विवाह किया है, जो व्यापार के सिलसिले में इस समय नगर से बाहर गए हुए हैं।

दो दिन पहले हमने इन शिशुओं को जन्म दिया है, जो परिचारिका की बाँहों में है। इन शिशुओं में एक लड़का है, दूसरी लड़की। ये एक समय में ही पैदा हुए हैं। इस मूर्ख परिचारिका ने इन्हें नहलाने के लिए लिया था, किंतु अब याद नहीं कर पा रही है कि इसने कौन सा शिशु किसके पास से उठाया था। चूँकि मैं बड़ी बहन हूँ, अतः कृपया लड़के को मुझे सौंपने की आज्ञा दें।

छोटी बहन, जो अभी तक चुपचाप सुन रही थी, बोली, ‘मेरे प्रभु! मैंने एक सप्ताह पहले एक स्वप्न देखा था कि मुझे लड़का हुआ है। वह सपना प्रात:काल ब्राह्ममुहूर्त का था और प्रातः देखा गया सपना सच होता है, इसलिए मेरा विश्वास है कि लड़का मेरा ही है।’

राजा ने विस्मय से कहा, ‘अद्भुत मामला है ! दो भाइयों के घर शिशुओं ने जन्म लिया है। तुम भी दोनों बहनें हो। शिशु तो शिशु होता है, चाहे नर हो या नारी। मेरी इच्छा है कि तुम दोनों इन दोनों पर समान स्नेह वर्षा कर अपनाओ।’

‘धन्यवाद, अन्नदाता। किंतु मुझे विश्वास है कि नर शिशु मेरा बच्चा है। कृपया मुझे उसे ले जाने की अनुमति प्रदान करें।’ छोटी बहन ने कहा। ‘नहीं, नहीं! वह मेरा है ! उस पर सिर्फ मेरा ही अधिकार है।’ बड़ी बहन ने कहा।

राजा किंकर्तव्यविमूढ़ था। उसे समझ में नहीं आया। परेशानी में उसने खाँसा, आँखें झपझपाईं, सिर खुजाया। अचानक उसके चेहरे पर चमक आई। उसे खुशी हुई कि वेदपुरी का बुद्धिशाली राजा उसके समीप बैठा है। उसने सहायता की याचना करते हुए भरी दृष्टि से उसे देखा। राजा अपने मेहबान की मंशा समझ गया। उसने कहा, ‘यदि आप मुझे सही तौल की एक तराजू, एक ही वजन तथा आकार के मिट्टी के दो प्याले उपलब्ध कराएँ तो मैं इस समस्या का समाधान कर सकता हूँ।’

राजा के कहे अनुसार चीजें लाई गईं। उसने तराजू तथा प्यालों को देखा और अपनी इच्छानुसार उन्हें पाकर उन युवतियों को एक-एक प्याला देकर कहा, ‘आप दोनों इन प्यालों में चिति स्तर तक अपने वक्ष की दूध भरकर लाओ।’

दोनों माताएँ एक कमरे में गईं और अपने वक्ष की दूध-धार से उन प्यालों को भरकर लौटीं। अतिथि राजा ने सावधानी से प्यालों में भरे गए दूध को अपनी पैनी दृष्टि से जाँचा-देखा। दोनों एक ही स्तर तक भरे हुए थे।

बड़ी बहन बेहम ने अपने प्याले को तराजू के दाएँ पलड़े में रखा तथा छोटी बहन बीवी ने बाएँ पलड़े में। दाहिनी ओर का पलड़ा जरा नीचे की ओर झुका। राजा ने हँसते हुए कहा, ‘लड़का बड़ी बहन बेहम का है।’

इतना सुनते ही राजदरबार में उपस्थित सभी ने तालियों की गड़गड़ाहट से इस निर्णय की प्रशंसा की। बुद्धिशाली राजा ने छोटी बीवी की ओर देखा। वह भी ताली बजा रही थी। राजा तुरंत समझ गया कि उसकी बुद्धि की कुशाग्रता के लिए यह नाटक रचा गया है। दरबार में सभी को मालूम था कि लड़का बेहम का है।

मेजबान राजा ने कहा, ‘आपने अपनी बुद्धिमत्ता प्रमाणित कर दी है। ये दोनों माताएँ मेरी रानी की सेविकाएँ हैं। हम अत्यंत ही आभारी होंगे यदि आप हमें यह बताएँ कि आपने यह निर्णय किस आधार पर लिया?’

‘बहुत ही आसान।’ वेदपुरी के राजा ने कहा, ‘नारी का शरीर कोमल तथा नाजुक होता है। जबकि नर का कठोर और शक्तिशाली, क्योंकि उसे जीवन भर परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए प्रकृति भी नर शिशु को जन्म देने वाली माताओं को भारी दूध देकर आशीष देती है। तराजू का दायाँ पलड़ा भारी था, जिस पर बेहम ने दूध का प्याला रखा था। अतः बेहम ही नर शिशु की माँ है। इसमें कोई संदेह या शक नहीं था।’

राजा के इस वैज्ञानिक और तार्किक उत्तर से अभिभूत हो, पुनः सभी ने करतल ध्वनि से उसका अभिनंदन किया।

पाँच दिन व्यतीत हो चुके थे मेजबान के महल में। इसी बीच राजा चिनचिन्ना के पास सूचना पहुँच चुकी थी कि उसका दुश्मन राजा भिखारी के वेश में उसके राज्य को पार कर गया। राज चिनचिन्ना ने योजना बनाई कि वेदपुरी के राजा को वापसी में घेरकर मृत्यु के घाट उतार दिया जाएगा।

वेदपुरी के राजा ने अपने आतिथ्य से कहा कि वह कल सुबह सूरज उगने के साथ समुद्री राह से अपने राज्य लौट रहा है।

‘मैं आपकी सेवा में क्या भेंट करूँ?’ मेजबान ने पूछा।

‘दो बैल तथा एक हल।’

‘क्या ! इतनी साधारणा चीजें?’

‘साधारण? साधारण जब तक है, तब तक उन्हें जमीन में चलाकर खेती न की जाए। क्या हम कृषि पर निर्भर नहीं हैं ? इससे उत्तम उपहार आप मुझे और क्या भेंट कर सकते हैं?’

“जैसा आप चाहें, मेरे मित्र। उसके साथ मैं मेरे सौ सिपाही और एक सुंदर जहाज भी आपको भेंट करता हूँ।’

‘मेरी बुद्धि ही मेरी रक्षा करेगी। राजा ने टिप्पणी की।

राजा चिनचिन्ना को जासूसों ने खबर दी कि वेदपुरी का राजा समुद्री जहाज मार्ग से जहाज द्वारा अपने राज्य वापस लौटने वाला है। उसने तुरंत हजारों सैनिकों को शस्त्रों सहित उसी रात नौकाओं द्वारा समुद्र में उतार दिया। उसने उन्हें आज्ञा दी कि जैसे ही वह जहाज वेदपुरी के बंदरगाह की ओर जाता देखें, विषैले बाणों से उस पर आक्रमण कर दें।

प्रातः से पूर्व राजा जागा और मेहमान को विदा करने चल पड़ा। जब वह समुद्र किनारे पहुँचा तो पाया, नाविक बुद्धिशाली राजा की प्रतीक्षा कर रहे थे। जहाज पूर्ण रूप से शृंगारित ही उनके स्वागत में तैयार था।

मेजबान राजा शाही अतिथि-गृह में गया। अतिथि वहाँ भी नहीं था। उसने महल के पिछवाड़े में जाकर देखा। उसने आश्चर्य से देखा कि बैलों की जोड़ी तथा हल, जो उसने वेदपुरी के राजा को भेंट में दिए थे, वे भी वहाँ नहीं थे।

मेजबान राजा सारी स्थिति को समझ गया। उसने समुद्र किनारे से जहाज तथा सैनिकों को तुरंत वापस नहीं बुलाया।

बाद में उसके पास समाचार पहुँचा कि वेदपुरी के राजा बैलों की जोड़ी तथा हल को कंधे पर रखकर किसान वेष में राजा चिनचिन्ना के राज्य को पार कर, सुरक्षित अपने राज्य वेदपुरी पहुँच गए हैं।

कथा समाप्त कर चेन्नईराम ने प्रश्नवाचक दृष्टि से अपने पुत्र की ओर देखा?

पुत्र ने कहा, ‘आप सच कहते हैं पापा! तीक्ष्ण बुद्धि और उसके चातुर्य से किसी भी संकट का सामना किया जा सकता है और अनुभवों से समस्या का समाधान।’

(साभार : डॉ. ए. भवानी)

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