Sunday, February 25, 2024
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स्वप्न पूर्ति : पंजाबी लोक-कथा

Swapna Poorti : Punjabi Lok-Katha

एक राजा था। उसके सात पुत्र थे। वह राजा एक दिन अपने महल में आराम कर रहा था, तो उसे एक स्वप्न आया। वह स्वप्न उसने अगले दिन सभा के मंत्रियों को बताया कि एक ऐसा वृक्ष है, जिस पर स्वर्ण की शाखाएँ, चाँदी के पत्ते हैं और वहाँ पर हाथी दाना चुगते थे। सभी मंत्रियों ने अपनी-अपनी बुद्धि का प्रयोग किया, परन्तु किसी को कुछ भी पता न चला। राजा ने सोचा कि इस स्वप्न को पूरा करने के लिए क्यों न मैं अपने पुत्रों को कहूँ।

सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञा का पालन किया और वह वृक्ष लाने के लिए चल पड़े। सभी ने वृक्ष लाने के लिए अपने-अपने विचार पेश किए। अन्त में वह दो-दो के समूह में बँटकर चल पड़े। छोटा राजकुमार अकेला ही चल पड़ा। कुछ दिनों के पश्चात् वह एक साधु की कुटिया में पहुंचा उसने देखा कि साधु ने समाधि लगाई हुई है। उसने साधु के सूखे बाग को पानी देना आरम्भ कर दिया। कुछ ही दिनों में वह बाग हरा-भरा हो गया।

जब साधु समाधि से हटा तो वह अपने बाग को हरा-भरा देखकर हैरान रह गया। उसने ऊँची आवाज़ में कहा, “मेरे बाग को फिर से हरा-भरा करने वाला कौन है ?” यह सुनकर राजकुमार डर गया और साधु के चरणों में जा गिरा और कहने लगा, “मैं आपका दास हूँ।” यह सुनकर उस साधु के हृदय में नम्रता आई और साधु ने राजकुमार को तीन वचन प्रदान किए।

साधु ने कहा, “वत्स ! जो तुम्हें चाहिए, माँग लो।” राजकुमार ने कहा, “हे महात्मा जी ! आप का दिया हुआ मेरे पास सब कुछ है। मुझे किसी भी वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं है। साधु ने फिर से राजकुमार को वचन माँगने के लिए कहा, तो राजकुमार ने अपना पहले वाला उत्तर ही दिया। अब साधु ने तीसरी बार कहा, “वत्स ! माँग लो, तीसरा वचन है।” राजकुमार ने कहा, “मैं अपने पिताजी की आज्ञा का पालन करने के लिए आया हूँ। वह आज्ञा यह है कि एक ऐसा वृक्ष है, जिसकी शाखाएँ स्वर्ण की हैं, उसके पत्ते चाँदी के हैं और वहाँ पर हाथी दाना चुगते हैं। यह वृक्ष मैंने लेकर जाना है। साधु ने राजकुमार को हौसला दिया और एक पत्र लिखकर उसके हाथ में पकड़ा दिया और कहा कि तुम आराम करो। राजकुमार कुछेक दिनों के लिए वहीं पर रुक गया। साधु ने राजकुमार को बताया, “इस दिशा में एक तालाब है, जिसमें सात परियाँ रहती हैं। उनकी सात कोठरियाँ हैं। तुम सातवीं कोठरी में चले जाना।”

राजकुमार ने सत्य वचन कहा और वहाँ से चल पड़ा। कुछ दिनों के उपरान्त वह उस तालाब पर पहुँच गया और जाकर सातवीं कोठरी में बैठ गया।

परियाँ बाहर गईं हुईं थीं। सबसे पहली ने कहा, “यदि मेरी कोठरी में कोई हुआ, तो मैं उसे मार दूंगी।” दूसरी ने कहा, “मैं उसे खा ही जाऊँगी।” तीसरी ने कहा, “मैं उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगी।” इसी प्रकार छः परियों ने तो मरने-मारने की बातें की, परन्तु सातवीं परी का हृदय कोमलता से परिपूर्ण था। उसने कहा, “मैं उसके आने का कारण पूछंगी और उससे स्नेह दिखाऊँगी।”

राजकुमार का हृदय धक-धक् कर रहा था, परन्तु आखिरी बात सुनकर उसके हृदय की धड़कन सँभल गई। जब परी ने राजकुमार को देखा, तो उसके आने का कारण जानना चाहा। राजकुमार ने बताया, “मेरे पिताजी को एक रात को यह स्वप्न आया कि एक ऐसा वृक्ष है, जिसकी शाखाएँ स्वर्ण की हैं, उसके पत्ते चाँदी के हैं और वहाँ पर हाथी दाना चुगते हैं। साथ ही राजकुमार ने बताया कि वह कौन-से साधु के पास से यहाँ आया है।

परी ने सारी बात ध्यानपूर्वक सुनी और उस पर कहीं भी जाने की बन्दिश लगा दी और कहा, “मैं स्वयं उस वृक्ष को लेकर आऊँगी।” उसने राजकुमार के लिए खाने-पीने का प्रबन्ध कर दिया और वह स्वयं परियों के देश में चली गई। लगभग दो सप्ताह व्यतीत हो गए, परन्तु वह परी वापस नहीं आई। जब परी वापस आई तो उसने अपने जादू से उस वृक्ष को एक डिबिया में बन्द कर दिया।

परी ने राजकुमार से पूछा, “उसकी कमीज़ के भीतर एक जेब है।” यह सुनकर राजकुमार ने कहा, ‘मेरी कमीज़ के भीतर कोई भी जेब नहीं है।” अब परी ने भीतर की तरफ एक जेब लगाकर उसमें वृक्ष वाली डिबिया डाल दी और बाहर वाली जेब में राख की डिबिया डाल दी और कहा, “किसी को भी बताना मत। यदि किसी शत्रु ने आक्रमण कर दिया तो राख वाली डिबिया उसे दे देना।”

राजकुमार परी से वृक्ष लेकर चल पड़ा और उस डेरे में आ गया, जहाँ पर उसने बाग को हरा-भरा किया था। साधु ने पूछा, “वत्स ! क्या स्वप्न पूरा हो गया ?” राजकुमार ने कहा, “महात्मा जी ! स्वप्न पूर्ण हो गया है।” साधु ने उसे एक डण्डा और रस्सी दी और कहा, “यदि तुम इस डण्डे और रस्सी को किसी को भी पकड़ने या मारने का आदेश दोगे, या फिर कहीं पानी के स्रोत सुखा देने के लिए कहोगे, तो यह तुम्हारी आज्ञा का पालन करेंगे।” राजकुमार “सत्य वचन” कहकर अपने देश की ओर चल पड़ा।

चारों भाई चौराहे पर इकट्ठे हो गए। सभी एक-दूसरे से पूछते रहे, परन्तु किसी ने भी नहीं बताया। सबका हृदय शंकित हुआ कि अवश्य ही छोटा राजकुमार वृक्ष लेकर आया होगा। अब तक वे सभी एक हो चुके थे और छोटे के विरुद्ध हो गए थे। जब छोटा राजकुमार उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने उसकी तलाशी ली। राजकुमार ने अपनी जेब से राख की डिबिया निकाल कर उन्हें सौंप दी। उन्होंने उसे मारा-पीटा भी। सभी डिबिया मिलते ही प्रसन्नचित्त हो उठे और वह डिबिया राजदरबार में खोली गई, जब तो उसमें से राख निकली। राजा क्रोधित हो गया और उनको देश निकाला दे दिया।

सभी भाई देश-निकाला दिए जाने के बाद उसी चौराहे पर इकट्ठे हो गए और छोटे राजकुमार को मार-पीट कर एक कुँए में फेंक दिया। जब डण्डे ने पानी को छुआ तो उस कुँए का पानी सूख गया। एक यात्री आया, उसने पानी निकालने के लिए ढोल को लटकाया तो भीतर से आवाज़ आई, “पहले मुझे बाहर निकालो, फिर पानी आएगा।” उसने उसको कुँए से बाहर निकाला और पानी पी लिया।

वह राजा के दरबार में पहुँचा, तो उसने कहा, “पिताजी ! मैं वृक्ष ले आया हूँ।” राजा ने कहा, “तुम भी दूसरों की तरह मेरी इज़्ज़त मत खराब कर देना।” सुबह हुई तो राजा ने दरबार लगाया और जब राजकुमार ने डिबिया खोली तो उसमें से एक वृक्ष निकला, जिसका स्वप्न राजा को आया था। राजा ने अब अपना राजसिंहासन छोटे राजकुमार को सौंप दिया और स्वयं आराम से जीवन व्यतीत करने लगा। अब दूसरे भाई किसी दूसरे राजा के पास नौकरी-चाकरी करने लग गए। उनके हृदय में राज्य-प्राप्ति की तमन्ना भड़क उठी। उन्होंने छोटे भाई को मार डालने का पूरा प्रयत्न किया, परन्तु इस प्रयास में उनको असफलता का ही मुँह देखना पड़ा।

साभार : डॉ. सुखविन्दर कौर बाठ

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